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भारतीयों की उच्च प्रतिरोधक क्षमता ने दी कोरोना के दूसरे स्ट्रेन को मात, रिसर्च में दावा

बीएचयू के प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे के नेतृत्व में 74 वैज्ञानिकों के शोध में हुआ खुलासा छह राज्यों के 14 जिलों में चार महीने तक सर्वेक्षण कर लिये गए सैंपल

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पत्रिका न्यूज नेटवर्क

वाराणसी. भारत में कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर बेअसर है। भारत में जनजीवन तेजी से सामान्य हो रहा है। एक बार फिर पहले की तरह सड़कों पर चहल-पहल और बाजारों में भीड़भाड़ है। जहां इटली, फ्रांस, ब्राजील और ब्रिटेन जैसे दशों में कोरोना की दूसरी लहर बेकाबू हो चुकी है वहीं भारत में इसका असर क्यों नहीं हुआ इसका पता चल गया है। इसका जवाब वैज्ञानिकों ने खोजा लिया है। बीएचयू के जीन विज्ञानी प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे के नेतृत्व में 74 वैज्ञानिकों के शोध में ये बात सामने आयी है। इनकी टीम ने छह राज्यों के 14 जिलों में चार महीने तक सर्वेक्षण कर 2306 लोगों के सैंपल के आधार पर इस बात का पता लगाया है कि 76 प्रतिशत भारतीयों में कोरोना के लक्षण (एसिंप्टोमैटिक) हैं ही नहीं। यह शोध अमेरिका के मशहूर जर्नल मेड आर्काइव के प्री-प्रिंट में पब्लिश भी हुआ है।


प्रो. चौबे के मुताबिक इस शोध के लिये मुंबई की बायोसेंस टेक्नोलाजी की एंटीबाडी किट का इस्तेमाल किया गया। इसमें देश-विदेश के 32 संस्थानों के 74 वैज्ञानिकों ने हिस्सा लिया। शोध में बीएचयू से प्रज्ज्वल सिंह, अंशिका श्रीवास्तव के अलावा आइएमएस, बीएचयू के डा. अभिषेक पाठक व डा. पवन दुबे, यूनिवर्सिटी आफ अलबामा अमेरिका के प्रो. केके. सिंह, काेलकाता यूनिवर्सिटी से डा. राकेश तमांग और मंगलौर से डा. मुश्ताक आदि शामिल थे।


भारतीयों में विकसित हुई प्रतिरोधक क्षमता

प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे के नेतृत्व में शोधकर्तओं की टीम ने ऐसे लोगों का सैम्पल लिया जो रोजाना भीड़भाड़ में रहते हैं और जिन्हें संक्रमण का सबसे अधिक खतरा है। इनपर शोध के बाद यह बात सामने आयी कि भारत में दूसरे कोरोना की दूसरी लहर इसलिये प्रभावी नहीं हो सकी क्योंकि यहां भीड़ भाड़ में रहने वालों में कोरोना के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो चुकी है। शोध में यह बात सामने आयी कि 76 फीसदी भारतीयों में कोरोना के लक्षण नहीं हैं और 30 फीसद में एंटीबाॅडी विकसित हो चुकी है। पूर्वांचल में 41 फीसदी लोग कोविड के प्रति प्रितरक्षित हो चुके हैं। यही वजह रही कि इम्यून हो चुके लोगों पर कोरोना के दूसरे स्ट्रेन का असर नहीं हुआ। कोरोना के सबसे बड़े वाहकों में प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाने के चलते दूसरी लहर की चेन टूट गई।


वायरस से मुकाले की ताकत भारतीयों के जीन में

शोध में ये बात भी सामने आयी है क आखिरकार यूरोप और अमेरिका के देशों की तुलना में भारतीयों पर इसका व्यापक असर क्यों नहीं हो सका। प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे के मुताबिक भारत में कोरोना संक्रमित 100 में से 76 लोग बिना लक्षण वाले हैं। इसके उलट यूरोप और अमेरकिा इनकी संख्या महज 10 फीसद है। यही वजह है कि उन देशों में कोरोना के प्रति भारतीयों जितनी इम्युनिटी नहीं विकसित हुई। इससे ये बात भी सामने आयी कि वायरस को प्रभावी न होने देने की क्षमता भारतीयों के जीन में है।


वास्तविक मृत्युदर 17गुना कम

शोध में यह बात भी सामने आयी है कि एसिम्प्टोमैटिकों की तादाद को को जोड़ लिया जाए तो भारत में कोरोना संक्रमण से मौत के अलग ही आंकड़े सामने आते हैं। कुल सक्रमितों की संख्या सरकारी आंकड़ों से 25 गुना बढ़ जाती है और इसके आधार पर मृत्युदर भी 17 गुना कम हो जाती है।


आयुर्वेदिक उपचार

प्रो ज्ञानेश्वर के अनुसार कोविड काल ने भारत के तकरीबन हर घर में आयुर्वेदिक उपचारों और औषधियों की पहुंच सुनिश्चत की है। आयुष संजीवनी एप से जुड़े डेढ़ करोड़ लोगों में से 80 फीसद ने आयुष उपायों का उपयोग किया है।