
नोटबंदी के दौरान हुई सबसे चर्चित मौत
वाराणसी. वो नोटबंदी की घोषणा की सुबह थी और बैंक पर ताला लटका था। मैले कुचैले कपड़ों मे 60 साल की तीर्थराजी वहीं सीढ़ियों पर बैठ देर तक बैंक के खुलने का इंतजार कर रही थी। पास की चाय की दुकान पर बैठे किसी व्यक्ति ने जब काफी देर से उसे बैठे देखा तो पूछा, माई यहां क्यों बैठी हो। उसने अपनी आंचल की गांठ में रखे हजार-हजार के दो नोट निकाले और कहा, इसे जमा करना है। यह सुनकर उस व्यक्ति ने कहा, "ये नोट अब नहीं चलते माई" इतना सुनना था कि तीर्थराजी की आंख से दो आंसू टपके और वहीं गिरकर उसने दम तोड़ दिया। तीर्थराजी की कहानी अकेला मामला नहीं है। नोटबंदी के दौर ने बेहद गरीब पूर्वांचल के ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में न जाने कितनी जानें लीं हैं। आज भी बनारस के बुनकर उबर नहीं पाए हैं और कारोबार पहले से अधिक बर्बाद हो चुका है। आलू और प्याज के किसान त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। सीमान्त आदिवासी खेतिहर अपना काम धंधा छोड़ अन्य राज्यों में पलायन कर रहे हैं। पूर्वांचल के गरीबों के लिये नोटबंदी एक कभी न खत्म होने वाला दु:स्वप्न साबित हुआ है। भारत सरकार ने आठ नवंबर 2016 में 500 और एक हजार रुपये के नोटों का प्रचलन बंद कर दिया था। नोटबंदी में तीर्थराजी की मौत की खबर ने पूरे देश में लोगों को झकझोर कर रख दिया था।
मामला यूपी के कुशीनगर जिले का था और मरने वाली महिला 60 साल की तीर्थराजी थी जिसके पास एक-एक हजार रुपये के केवल दो ही नोट थे। तीर्थराजी देवी कप्तानगंज क्षेत्र के करनहा टोला की रहने वाली थी, जिसका पति राम प्रसाद लोगों के कपड़े धुलकर अपना घर चला था है। गरीब होने के चलते 60 साल की तीर्थराजी खुद भी मजदूरी करती थी। किसी तरह उसने बचा-बचाकर किसी तरह से बचा-बचाकर दो हजार रुपये रखे थे। गरीब थी तो टीवी जैसी चीज उसके लिये गूलर का फूल थे। टीवी होता भी तो स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह समझ पाती कि प्रधानमंत्री जी कह रहे हैं कि अब 500 और 1000 रुपये के नोट आधी रात के बाद से नहीं चलेंगे।
वह दूसरे दिन अपने बचाए हुए हजार रुपये के दो नोट और पासबुक लेकर सुबह-सुबह सेंट्रेल बैंक में रुपया जमा करने आयी थी। काफी देर तक वह खड़ी थी। इस दौरान पास ही चाय की दुकान पर भीड़ थी। लोग नोटबंदी की चर्चा कर रहे थे। तीर्थराजी को अपनी पासबुक बार-बार हाथ में लेते देख किसी ने आकर कहा माई अब ये नोट नहीं चलते। इतना सुनते ही तीर्थराजी गिरी और उसकी मौत हो गई। उसे यह समझ में आया होगा कि उसकी गाढ़ी कमाई के दो हजार रुपये बर्बाद हो गए। दो हजार रुपये का बर्बाद होने का सदमा वह बर्दाश्त नहीं कर सकी और चक्कर खाकर गिरी। लोग दौड़े पर वह तो मर चुकी थी।
उसकी पासबुक में मोबाइल नंबर लिखा हुआ था, जिसपर फोन कर मौके पर मौजूद लोगों ने उसके परिजनों को फोन किया तो वो आकर उसका शव गांव ले गए। उस समय गांव की प्रधान ध्रुवपती देवी के पति अवधेश साहनी ने बताया था कि राम प्रसाद बेहद गरीब है। उसके तीन बेटे भी अलग रहते हैं और मजदूरी कर आजीविका चलाते हैं। तीर्थराजी और राम प्रसाद भी मेहनत मजदूरी कर गुजार कर रहे थे।
Published on:
08 Nov 2017 10:18 pm
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