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डॉ लोहिया जयंती पर विशेषः “राम,कृष्ण व शिव ने हमें नहीं, हमने इन्हें बनाया है…”

लोहिया कहते थे कोई आदमी वास्तव में हुआ या नहीं यह इतना बड़ा सवाल नहीं है, जितना कि उनके काम किस हद तक हैं, कितनों के दिमाग पर कितना है असर।

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डॉ राम मनोहर लोहिया

डॉ राम मनोहर लोहिया

डॉ अजय कृष्ण चतुर्वेदी

वाराणसी. देश की मौजूदा सियासत राम, कृष्ण और शिव के इर्द-गिर्द ही घूम रही है। खास तौर पर भाजपा और कांग्रेस। दोनों को लगता है कि मंदिर जाने, हिंदू दिखाने, ब्राह्मण साबित करने से ही वो सत्ता पर काबिज रहेंगे या हो जाएंगे। इस सेकुलर राष्ट्र में तकरीबन दो दशक से राम पर राजनीतिक पारियां खेली जा रही हैं। लेकिन राम, कृष्ण और शिव को कितना जानते हैं हम इसका बखूबी बखान किया है डॉ राम मनोहर लोहिया का जिनकी जयंती है शुक्रवार यानी 23 मार्च को। डॉ. लोहिया के शब्दों में मर्यादा मायने राम, उन्मुक्तता मायने कृष्ण और असीमित मायने शिव। वह कहते हैं कि राम,कृष्ण और शिव हिंदुस्तान की उन तीन चीजों में है, मैं उनको आदमी कहूं या देवता, इसके दो खास मतलब नहीं होंगे, जिनका असर हिंदुस्तान के दिमाग पर ऐतिहासिक लोगों से कहीं ज्यादा है। वह बताते हैं कि कोई आदमी वास्तव में हुआ या नहीं यह इतना बड़ा सवाल नहीं है, जितना कि उनके काम किस हद तक हैं। कितने लोगों को मालूम है और उसका कितना असर है दिमाग पर। तो ये तीनों ऐसी चीज तो हैं ही जिनका अस्तित्व हिंदुस्तानी समाज के दिमाग में घर कर चुका है।

राम,कृष्ण व शिव ने हमें नहीं, हमने इन्हें बनाया है
डॉ. लोहिया कहते थे कि राम, कृष्ण व शिव ने हमको नहीं बनाया, हमने इन्हें बनाया है और ये एक दिन के बनाये नहीं हैं। सच यही है कि करोड़ों हिंदुस्तानियों ने युग युगांतर में, हजारों वर्षों में राम, कृष्ण और शिव को बनाया है। उनमें अपनी हंसी और सपनों के रंग भरे तब राम, कृष्ण और शिव जैसी चीजें सामने हैं।

राम पर रोक है तो कृष्ण स्वयंभू हैं और शिव असीमित

लोहिया कहते हैं राम की महिमा उनके नाम से मालूम होती है, जिसमें कि उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कह कर पुकारा जाता है। वह जो मन में आया वह नहीं कर सकता। राम की ताकत बंधी हुई है। उसका दायरा खिंचा हुआ है। राम की ताकत कुछ नीति, शास्त्र या धर्म, व्यवहार या मौजूदा दुनियावी शब्दों में कहें तो विधान की मर्यादा हैं। जिस तरह से किसी भी कानून की जगह जैसे विधानसभा या लोकसभा पर विधान रोक लगा दिया करता है उसी तरह राम के कामों पर रोक लगी हुई है। दरअसल पुराने दकियानूसी लोग जो राम और कृष्ण को विष्णु का अवतार मानते हैं ने राम को आठ तो कृष्ण को 16 कलाओं का अवतार माना है। यानी कृष्ण संपूर्ण व राम अपूर्ण। हालांकि ऐसे मामलों में कोई अपूर्ण या संपूर्ण नहीं हुआ करता। राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। उनकी ताकतों के ऊपर रोक है लेकिन कृष्ण बिना रोक के स्वयंभू है। वह राग से परे रह कर सब कुछ कर सकते हैं। उनके लिए नियम व उप नियम नहीं हैं। वहीं शिव एक निराली अदा वाला व्यक्ति है। दुनिया भर में ऐसी कोई किंवदंती नहीं जिसकी न लंबाई हो न चौड़ाई औ र न मोटाई। लोहिया बताते हैं कि एक फ्रांसीसी लेखक ने शिव को नान डाइमेंशनल मिथ करार दिया है। यानी जिसकी कोई सीमा नहीं। दरअसल शिव ही एक ऐसी किंवदंती है जिसका न कोई आगा है न पीछा है। फिर भी शिव ही एक ऐसी किंवदंती है जिसका हरेक काम अपने औचित्य को अपने आप में रखता है।

क्या है हंसी और सपने


डॉ. लोहिया महज एक राजनीतिक व्यक्तित्व नहीं है। वह चिंतक, अध्येता भी थे। वह दार्शनिक भी थे। तभी तो वह हंसी और सपने की व्याख्या करते हैं। बताते हैं कि किसी भी देश की हंसी और सपने महान किंवदंतियों में खुदे रहते हैं। हंसी और सपने, इन दो से और कोई चीज दुनिया में बड़ी हुआ ही नहीं करती। वह बताते हैं कि जब कोई राष्ट्र हंसा करता है तो वह खुश होता है, उसका दिल चौड़ा होता है और जब कोई राष्ट्र सपने देखता है तो वह अपने आदर्शों में रंग भर कर किस्से बना लिया करता है।

हंसी और सपनों का है खासा महत्व
राम और कृष्ण तो विष्णु का स्वरूप हैं और शिव महेश के। आम तौर पर यह मान लिया जाता है कि राम और कृष्ण तो रक्षा या अच्छी चीजों की हिफाजत के प्रतीक हैं और शिव विनाश या बुरी चीजों के नाश के प्रतीक। वह कहते हैं कि कोई हंसी और सपने बेमतलब हो सकते हैं पर जो जितना बेमतलब होगा वह उतना ही अच्छा होगा। क्योंकि हंसी और सपने तो बेमतलब हुआ करत हैं फिर भी उनका असर पड़ता है। छाती चौड़ी होती है इनसे, अगर कोई कौम अपनी छाती मौके-मौके पर ऐसी किंवदंतियों को याद कर चौड़ी कर लेती हो तो फिर उससे बढ़ कर क्या हो सकता है।

ऐसे नेता जिन्होंने अपने दम पर शासन का रुख बदल दिया


देश की राजनीति में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान और स्वतंत्रता के बाद कई ऎसे नेता हुए जिन्होंने अपने दम पर शासन का रूख बदल दिया जिनमें एक थे राममनोहर लोहिया। अपनी प्रखर देशभक्ति और बेलौस तेजस्‍वी समाजवादी विचारों के कारण अपने समर्थकों के साथ ही डॉ. लोहिया ने अपने विरोधियों के मध्‍य भी अपार सम्‍मान हासिल किया। डॉ. लोहिया सहज परन्तु निडर अवधूत राजनीतिज्ञ थे। उनमें सन्त की सन्तता, फक्कड़पन, मस्ती, निर्लिप्तता और अपूर्व त्याग की भावना थी।

प्रखर समाजवादी विचारक थे
वह प्रखर समाजवादी विचारक थे। मानव की स्थापना के पक्षधर समाजवादी थे। वह इस अर्थ में समाजवादी थे कि, समाज ही उनका कार्यक्षेत्र था और वे अपने कार्यक्षेत्र को जनमंगल की अनुभूतियों से महकाना चाहते थे। वह चाहते थे कि, व्यक्ति-व्यक्ति के बीच कोई भेद, कोई दुराव और कोई दीवार न रहे। सब जन समान हों। सबका मंगल ? हो। सबमें वे हों और उनमें सब हों। वह दार्शनिक व्यवहार के पक्ष में नहीं थे। उनकी दृष्टि में जन को यथार्थ और सत्य से परिचित कराया जाना चाहिए। प्रत्येक जन जाने की कौन उनका मित्र है? कौन शत्रु है? जनता को वे जनतंत्र का निर्णायक मानते थे।

तमसा किनारे चैत्र नवरात्र तृतीया को हुआ जन्म


डॉ राम मनोहर लोहिया का जन्म अकबरपुर में चैत्र तृतीया, 23 मार्च 1910 की प्रात: तमसा नदी के किनारे स्थित कस्बा अकबरपुर, फैजाबाद में हुआ था। उनके पिता हीरालाल पेशे से अध्यापक थे। उनके पिताजी गांधी जी के अनुयायी थे। जब वह गांधी जी से मिलने जाते तो राम मनोहर को भी अपने साथ ले जाया करते थे। इसके कारण गांधी जी के विराट व्यक्तित्व का लोहिया पर गहरा असर हुआ। लोहिया जी अपने पिताजी के साथ 1918 में अहमदाबाद कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार शामिल हुए।

पहली पाठशाला बनी टंडन पाठशाला, बीएचयू से किया इंटर
लोहिया जब पांच वर्ष के हुए तो पास ही की टंडन पाठशाला में उनका नाम लिखा दिया गया। तमसा पार स्थित विश्वश्वरनाथ हाई स्कूल में लोहिया को पांचवीं कक्षा में प्रवेश दिलाया गया। लोहिया को तीसरा स्कूल मिला- मारवाड़ी विद्यालय। काशी हिन्दू विश्विद्यालय से इंटर (पीयूसी) करना शुरू कर दिया। काशी उस समय राष्ट्रीय शिक्षा का गढ़ समझा जाता था। 1927 में वहां से उन्होंने पीयूसी उत्तीर्ण किया। इसके बाद 1927 में लोहिया कलकत्ता आ गए। सेंट जेवियर्स तथा स्काटिश चर्च जैसे ख्यातिनामा महाविद्यालय को छोड़कर विद्यासागर महाविद्यालय में प्रवेश लिया। इसके बाद लोहिया बर्लिन के लिए रवाना हो गए। वहां उन्होंने बर्लिन के हुम्बोल्ट विश्वविद्यालय में प्रवेश ले लिया। विश्वविख्यात अर्थशास्त्री प्रोफेसर बर्नर जोम्बार्ट उसी विश्वविद्यालय में थे। लोहिया ने उनको ही अपना निर्देशक तथा परीक्षक चुना।

30 सितंबर को दिल्ली के विलिंग्डन अस्पताल में ली अंतिम सांस
30 सितम्बर, 1967 को लोहिया को नई दिल्ली के विलिंग्डन अस्पताल, अब जिसे लोहिया अस्पताल कहा जाता है, में पौरूष ग्रंथि के आपरेशन के लिए भर्ती किया गया जहां 12 अक्टूबर 1967 को उनका देहांत 57 वर्ष की आयु में हो गया। कश्मीर समस्या हो, गरीबी, असमानता अथवा आर्थिक मंदी, इन तमाम मुद्दों पर राम मनोहर लोहिया का चिंतन और सोच स्पष्ट थी। कई लोग राम मनोहर लोहिया को राजनीतिज्ञ, धर्मगुरू, दार्शनिक और राजनीतिक कार्यकर्ता मानते है।