इस पूरी कवायद की असफलता की वजह फिक्की नहीं वो औद्योगिक घराने हैं ,जिन्होंने अब तक सोनभद्र की जल ,जमीन ,प्राकृतिक सम्पदा और श्रम का इस्तेमाल तो किया है लेकिन उसे बदले में कुछ भी नहीं दिया |फिक्की ने कई कपनियों को अपना पार्टनर तो बना लिया,लेकिन वास्तविक धरातल पर कंपनी सोनभद्र के आदिवासी युवकों के लिए कुछ भी नहीं किया सोनभद्र की विभीषिका ये है कि प्रदेश की औद्योगिक राजधानी होने के बावजूद यहाँ के युवकों को चाहे वो आदिवासी हो या गैर आदिवासी ,योग्य बनाने हेतु एक सरकारी आईटीआई के अलावा अन्य कोई प्रशिक्षण संस्थान नहीं है । पालीटेक्निक कालेज की बिल्डिंग ४ साल पहले ही बन कर तैयार हो गयी ,मगर कक्षाएं शुरू नहीं हो सकी ,नतीजा ये है कि यहाँ के छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए अन्य जिलों में जाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है।एक सबसे बड़ी समस्या आदिवासी समाज की आर्थिक स्थिति से जुडी है ,अपनी आजीविका के लिए वनोपजों पर निर्भर आदिवासी परिवारों के पास इतने पैसे नहीं होते कि वो अपने बच्चों को आगे की पढ़ाई कराएं,इसलिए ज्यादातर बच्चे 12वीं की पढाई के बाद हाँथ में कुदाल थाम लेते हैं। ये हकीकत है कि हर साल सोनभद्र से औसतन 10-15 हजार आदिवासी रोजगार की तलाश में दिल्ली,पंजाब,हरियाणा की और कूच कर जाते हैं ,सोनभद्र के कल-कारखानों में उनके लिए सिर्फ दिहाड़ी मजदूर के तौर पर जगह होती है ,वो भी ठेकेदार के मध्यम से।बाहर के राज्यों में भी उन्हें दिहाड़ी मजदूरी ही करनी पड़ती है।जब तक गिट्टी –बालू का खनन चालू था वो धूल फांकते हुए गिट्टीयां तोड़ा करते था ,पिछले आठ महीनो से ये विकल्प भी बंद है। तमाम दावों के बावजूद जनपद में जो भी कारखाने लगे उनमे स्थानीय आदिवासियों को रोजगार देने की समीचीन व्यवस्था नहीं की गयी।|यहाँ तक की विस्थापितों का भी समायोजन सही ढंग से नहीं किया गया। सोनभद्र के आदिवासी यहाँ की जमीन पर नए भारत का निर्माण कर रहे उद्योग समूहों से कोई अपेक्षा नहीं करते ,फिक्की के बारे में भी उन्हें नहीं मालूम।लेकिन वो ये जरुर जानते हैं कि प्रदेश को सर्वाधिक राजस्व देने वाले इस जनपद में उनकी स्थिति दोयम दर्जे की है उनके दिन नहीं बहुरने वाले।