18 जनवरी 2026,

रविवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

लाखों आदिवासी -गिरिजनों से फिक्की की धोखाधड़ी 

-उद्योगपतियों ने पहले यूपी के सोनभद्र जनपद को गोद लेने का किया ऐलान, फिर दे दिया धोखा 

5 min read
Google source verification

image

Awesh Tiwary

Jul 26, 2016

ficci cheat tribes in sonbhadra

ficci cheat tribes in sonbhadra

-आवेश तिवारी
वाराणसी.शिक्षा और रोजगार के अवसर से बेदखल कर दिए गए उत्तर प्रदेश के जनजाति बहुल सोनभद्र जनपद के आदिवासियों की कराह से पहाड़ों का सीना भले छलनी हो जाए लेकिन सत्ता और पूंजीवादी ताकतें नहीं पसीजती। कभी जमीन ,कभी जंगल कभी पानी ,कभी रोटी के लिए ठगे जाते रहे आदिवासियों के साथ धोखाधड़ी की एक नयी कहानी सामने आई है। ऐसी कहानी जिसके गवाह प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर उत्तर प्रदेश के बड़े ओहदों पर बैठे नौकरशाह तक हैं, लेकिन सभी ने अपने होंठ सी लिए हैं ,जनजाति होने के बावजूद आरक्षण से बेदखल सोनभद्र के आदिवासी युवा रोजगार के नाम पर देश के उद्योगपतियों द्वारा की जा रही इस वादाखिलाफी से अनजान है। देश के उद्योग तंत्र का नेतृत्व कर रहे भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग महासंघ (फिक्की) ने 2009 में किसी कूड़े के ढेर में पड़े बच्चे की तरह सोनभद्र को गोद लिया ,यहाँ के आदिवासी –गिरिजनों के लिए रोजगार मुहैया कराने के साथ-साथ उनकी जिंदगी को आसान करने के वायदे किये ,तमाम औद्योगिक घरानों के तथाकथित सामाजिक सरोकार की शान में कसीदे पढ़े गए ,बैठके की गयी और फिर चुपचाप एक दिन सबकी नजरों से बचाकर वापस उसे कूड़े के ढेर में डाल दिया गया |
गोद लिया और भूल गए
फिक्की की वादाखिलाफी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सोनभद्र के जिलाधिकारी को भी नहीं मालूम कि उनके जनपद को फिक्की ने गोद लिया है और पिछले दो सालों से यहाँ के आदिवासी गिरिजनों के लिए कई तरह की योजनायें चलायी जा रही है।फिक्की का दावा है कि सोनभद्र में एक हजार आदिवासी बच्चों के आईटीआई प्रशिक्षण की व्यवस्था की गयी है और जिनमे से लगभग 700 आदिवासी युवकों को रोजगार मुहैया कराया जा रहा है ,जबकि हकीकत ये हैं कि जनपद में कोई सरकारी आईटीआई नहीं है |जिस निजी आईटी आई में आदिवासी बच्चों को प्रशिक्षण दिए जाने की बात कही जा रही है वो छात्रों से फीस के नाम पर जमकर वसूली कर रहा है,और इसमें ज्यादातर छात्र बाहर के हैं |जिलाधिकारी कहते हैं इस तरह की दावेदारी हास्यास्पद है। शर्मनाक ये कि ये फिक्की द्वारा ये सारी कागजी कोरमबाजी असलियत का जामा पहनकर प्रधानमंत्री कार्यालय को भी प्रेषित की गयी है।
पीएमओ की अगुवाई में हुआ था फैसला
ये सारी कवायद कुछ साल पहले प्रधानमंत्री कार्यालय के प्रमुख सचिव की अध्यक्षता में जनजाति बहुल जनपदों के विकास को लेकर बुलाई गयी उस बैठक में शुरू हुयी जिसमे फिक्की ,एसोचेम और सीआईआइ के सदस्य मौजूद थे ,फिक्की ने डिपार्टमेंट अफ इंडस्ट्रियल पालिसी एंड प्रमोशन की सिफारिश पर उस बैठक में सोनभद्र को गोद लेने का ऐलान किया,कहा ये गया कि यहाँ की कूल आबादी का लगभग 47 फीसदी हिस्सा जनजातियों का है। फिक्की ने उस बैठक में कहा की सोनभद्र में मौजूद उद्योग समूहों ख़ास तौर से बिरला जी के हिंडाल्को के सहयोग से हम वहां जल्द ही आदिवासियों को प्रशिक्षित करने के लिए दो ट्रेनिंग सेंटर खोलने जा रहे हैं उसके बाद आदिवासियों के लिए एक रोजगार केंद्र भी खोलेंगे |फिक्की का कहना है किप्रधानमंत्री कार्यालय में हुए निर्णय के तत्काल बाद दिसंबर 2009 में फिक्की के तात्कालिक सहायक निदेशक आशुतोष रैना ने हिंडाल्को कनोरिया केमिकल समेत अन्य औद्योगिक प्रतिष्ठानों के प्रतिनिधियों और स्थानीय अधिकारियों के साथ बैठक की गयी जिसमे सोनभद्र के आदिवासियों के जीवनस्तर को ऊँचा उठाने के लिए कार्यक्रम निर्माण की घोषणा करते हुए “सोनभद्र कौशल विकास और आजीविका संवर्धन परिषद का गठन कर डाला और जिसका अध्यक्ष सोनभद्र के जिलाधिकारी को और फिक्की के सलाहकार राजन कोहली को संयुक्त रूप से बना दिया गया , उक्त बैठक में सोनभद्र के विकास के लिए दो वर्ष की परियोजना बनाकर यहाँ के आदिवासियों को रोजगार मुहैया कराने की बात कही गयी ,यहाँ के बभनी ,म्योरपुर,दुद्धी,चोपन और नगवा इत्यादि सबसे गरीब पांच ब्लाकों में से सबसे गरीब पांच गाँवों को चुनकर वहां सबसे पहले काम करने का निर्णय लिया गया |सुखद ये था कि सोनभद्र में प्रदूषण की भयावह स्थिति के लिए जिम्मेदार औद्योगिक समूहों ने सीना ठोककर उस बैठक में सोनभद्र को सोने जैसा बनाने का संकल्प लिया था |मगर इस परियोजना के लिए निर्धारित समय सीमा बीतने के बावजूद सारी कवायद धरी की धरी रह गयी |
केवल दावे ,नतीजा सिफर
लालमाटी के सूरज बैगा ने अपना बस्ता घर के बड़े बक्से में रख दिया है ,वो अब कालेज पढने नहीं जाता ,पहाड़ में सांवा –कोदो उगाता है ,उसे उम्मीद है कि एक दिन पहाड़ का सीना चीर कर ढेर सारे पैसे कमाएगा और वन विभाग से पिता का मुकदमा जीत कर दिखलायेगा। रिहंद के किनारे बसे भालुकुदर गाँव के लोग जहरीले पानी की वजह से अपने बाप दादा का गाँव छोड़ कर पलायन कर चुके हैं।उधर देश में निजीकरण के विरुद्ध आन्दोलन का सूत्रपात करने वाले डाला में आपको एक निजी सीमेंट कंपनी द्वारा बनाई गयी मीलों लम्बी बाउंड्रीवाल इन दिनों और बड़ी होती जा रही है ,जितनी लम्बी दीवाल उतना ही लंबा आदिवासियों का दर्द। फिक्की के अधिकारी इस स्थिति के लिए सीधे तौर पर सत्ता परिवर्तन को जिम्मेदार ठहराते हैं |फिक्की के अंशुमान चतुर्वेदी कहते हैं कि सोनभद्र के सारे अधिकारियों का स्थानान्तरण हो गया ,फिक्की में भी इस परियोजना को संचालित करने वाले कई लोग दूसरी जगहों पर चले गए ,जिसकी वजह से काम में थोडा विलम्ब हुआ |जब उनसे ये पूछा जाता है कि सोनभद्र को गोद लेने के बाद कितने पैसे खर्च किये गए तो वो इस बारे में कोई स्पष्ट जानकारी होने से साफ़ इनकार कर देते हैं। फिक्की का कहना है कि हमने “लारेस एजुकेड”नामक संस्था को सोनभद्र का दौरा कराया है ,जल्द ही हम कई और ट्रेनिंग सेंटर्स खोलेंगे ,अन्तराष्ट्रीय श्रम संगठन के सहयोग से भी इसी महीने एक ट्रेनिंग प्रोग्राम कराया जाएगा |ये पूछने पर कि दो साल की समय सीमा बीतने पर भी वास्तविक धरातल पर किसी प्रकार का कोई काम –काज न दिखने की वजह क्या है ?अंशुमन कहते हैं “जल्द ही आप सोनभद्र का बदला हुआ चेहरा देखेंगे। ”
हर साल बढ़ता जा रहा पलायन
इस पूरी कवायद की असफलता की वजह फिक्की नहीं वो औद्योगिक घराने हैं ,जिन्होंने अब तक सोनभद्र की जल ,जमीन ,प्राकृतिक सम्पदा और श्रम का इस्तेमाल तो किया है लेकिन उसे बदले में कुछ भी नहीं दिया |फिक्की ने कई कपनियों को अपना पार्टनर तो बना लिया,लेकिन वास्तविक धरातल पर कंपनी सोनभद्र के आदिवासी युवकों के लिए कुछ भी नहीं किया सोनभद्र की विभीषिका ये है कि प्रदेश की औद्योगिक राजधानी होने के बावजूद यहाँ के युवकों को चाहे वो आदिवासी हो या गैर आदिवासी ,योग्य बनाने हेतु एक सरकारी आईटीआई के अलावा अन्य कोई प्रशिक्षण संस्थान नहीं है । पालीटेक्निक कालेज की बिल्डिंग ४ साल पहले ही बन कर तैयार हो गयी ,मगर कक्षाएं शुरू नहीं हो सकी ,नतीजा ये है कि यहाँ के छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए अन्य जिलों में जाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है।एक सबसे बड़ी समस्या आदिवासी समाज की आर्थिक स्थिति से जुडी है ,अपनी आजीविका के लिए वनोपजों पर निर्भर आदिवासी परिवारों के पास इतने पैसे नहीं होते कि वो अपने बच्चों को आगे की पढ़ाई कराएं,इसलिए ज्यादातर बच्चे 12वीं की पढाई के बाद हाँथ में कुदाल थाम लेते हैं। ये हकीकत है कि हर साल सोनभद्र से औसतन 10-15 हजार आदिवासी रोजगार की तलाश में दिल्ली,पंजाब,हरियाणा की और कूच कर जाते हैं ,सोनभद्र के कल-कारखानों में उनके लिए सिर्फ दिहाड़ी मजदूर के तौर पर जगह होती है ,वो भी ठेकेदार के मध्यम से।बाहर के राज्यों में भी उन्हें दिहाड़ी मजदूरी ही करनी पड़ती है।जब तक गिट्टी –बालू का खनन चालू था वो धूल फांकते हुए गिट्टीयां तोड़ा करते था ,पिछले आठ महीनो से ये विकल्प भी बंद है। तमाम दावों के बावजूद जनपद में जो भी कारखाने लगे उनमे स्थानीय आदिवासियों को रोजगार देने की समीचीन व्यवस्था नहीं की गयी।|यहाँ तक की विस्थापितों का भी समायोजन सही ढंग से नहीं किया गया। सोनभद्र के आदिवासी यहाँ की जमीन पर नए भारत का निर्माण कर रहे उद्योग समूहों से कोई अपेक्षा नहीं करते ,फिक्की के बारे में भी उन्हें नहीं मालूम।लेकिन वो ये जरुर जानते हैं कि प्रदेश को सर्वाधिक राजस्व देने वाले इस जनपद में उनकी स्थिति दोयम दर्जे की है उनके दिन नहीं बहुरने वाले।

ये भी पढ़ें

image