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पूर्वांचल के ये पांच बाहुबली, जिनसे अपराध भी थर्राता है

सत्ता से जुडे लोग भी इनके प्रभाव से नहीं बच सके

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Bahubali

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वाराणसी. जुर्म की दुनिया हो या राजनीति के गलियारे या फिर कोई बड़ा कारोबार, हर जगह बाहुबली अपराधियों का असर और दखल दे रहा है। सत्ता से जुडे लोग भी इनके प्रभाव से नहीं बच सके। उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल से कई ऐसे बाहुबली निकलकर सामने आए, जिनके नाम का सिक्का लंबे समय तक चलता रहा। कई बाहुबली ताकतवर बनकर उभरे जिन्होंने पूर्वांचल में पुलिस को परेशान करके रखा।

मुख्तार अंसारी
यूपी का पूर्वांचल भी कई कुख्यात अपराधियों का गढ़ माना जाता है। यूं तो पूर्वांचल से कई नेता आए लेकिन एक ऐसा नाम इस क्षेत्र से आता है जो अपराध की दुनिया से राजनीति में आकर पूर्वांचल का रॉबिनहुड बन गया। उस बाहुबली नेता का नाम है मुख्तार अंसारी। प्रदेश के बाहुबली नेताओं में मुख्तार अंसारी का नाम पहले पायदान पर है। उनका जन्म यूपी के गाजीपुर जिले में हुआ था। किशोरवस्था से ही निडर और दबंग मुख्तार छात्र राजनीति में सक्रीय रहे। पूर्वांचल के विकास को लेकर कई योजनाएं जब शुरु हुई तो वहां जमीन कब्जाने को लेकर दो गैंग बन गए। मुख्तार अंसारी के सामने साहिब सिंह गैंग के ब्रजेश सिंह ने अपना अलग गैंग बनाया। ब्रजेश सिंह के साथ मुख्तार की दुश्मनी हो गई थी।
छात्र राजनीति के बाद जमीनी कारोबार और ठेकों की वजह से वह अपराध की दुनिया में कदम रख चुके थे। पूर्वांचल के मऊ, गाजीपुर, वाराणसी और जौनपुर में उनके नाम का सिक्का चलने लगा था। 2002 दोनों गैंग ही पूर्वांचल के सबसे बड़े गिरोह बन गए। एक दिन ब्रजेश सिंह ने मुख्तार अंसारी के काफिले पर हमला कराया। वहीं गोलीबारी हुई। हमले में मुख्तार के तीन लोग मारे गए। बृजेश सिंह इस हमले में घायल हो गया था। उसके मारे जाने की अफवाह थी. इस घटना के बाद बाहुबली मुख्तार अंसारी पूर्वांचल में अकेले गैंग लीडर बनकर उभरे। मुख्तार अब चौथी बार विधायक हैं।

बृजेश सिंह
बृजेश सिंह उर्फ अरुण कुमार सिंह का जन्म वाराणसी में हुआ था। उसके पिता रविन्द्र सिंह इलाके के रसूखदार लोगों में गिने जाते थे। बृजेश सिंह बचपन से ही पढ़ाई लिखाई में काफी होनहार था। 1984 में इंटर की परीक्षा में उसने अच्छे अंक हासिल किए थे। उसके बाद बृजेश ने यूपी कॉलेज से बीएससी की पढाई की। वहां भी उनका नाम होनहार छात्रों की श्रेणी में आता था। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। 27 अगस्त 1984 को वाराणसी के धरहरा गांव में बृजेश के पिता रविन्द्र सिंह की हत्या कर दी गई। उनके सियासी विरोधी हरिहर सिंह और पांचू सिंह ने साथियों के साथ मिलकर अंजाम दिया था। राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई में पिता की मौत ने बृजेश सिंह के मन में बदले की भावना को जन्म दे दिया। इसी भावना के चलते बृजेश ने जाने अनजाने में अपराध की दुनिया में अपना कदम बढ़ा दिया। आगे चलकर उसने अपने पिता के पांच हत्यारों को मौत की नींद सुला दिया। लेकिन मुख्तार अंसारी से दुश्मनी उसे काफी महंगी पड़ी। इसी के चलते ही बृजेश सिंह के चचेरे भाई सतीश सिंह की दिन दहाड़े हत्या कर दी गई। इस वारदात से पूरा पूर्वांचल दहल गया था।

राजन तिवारी
वह मूल रूप से उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के सोहगौरा गांव के रहने वाले हैं। उनका परिवार और रिश्तेदार इसी इलाके में बसे हुए हैं। उनका बचपन इसी गांव में बीता। राजन की प्रारम्भिक शिक्षा भी इसी जिले में हुई। लेकिन युवा अवस्था में उनके कदम बहक गए और राजन तिवारी ने जाने अनजाने ही अपराध की दुनिया में कदम रख दिया। इस दौरान पुलिस से बचकर वो बिहार भाग गए। वहां सियासत में कदम में रखा। दो बार विधायक भी रहे। अब फिर उन्होंने यूपी का रुख कर लिया है। यूपी के बीते विधान सभा चुनाव में राजन तिवारी पूर्वांचल में अहम भूमिका में दिखाई दिए थे। उनके कुशीनगर या देवरिया जिले से चुनाव भी लड़ने की अफवाहें भी थी।

विजय मिश्रा
15 साल पहले के चर्चित कांस्टेबल सूर्यमणि मिश्रा हत्याकांड से चर्चाओं में ज्ञानपुर के विधायक विजय मिश्रा का नाम भी पूर्वांचल के बाहुबलियों में गिना जाता है। दरअसल, विजय मिश्रा पर इल्जाम था कि उन्होंने इलाहाबाद डीआईजी के साथ तैनात सिपाही सूर्यमणि मिश्रा की गोली मार कर हत्या कर दी थी। ये वारदात 14 मई 2003 की सुबह 9 बजे के करीब हुई थी। बाद में सबूतों के अभाव और गवाहों की कमी के चलते विजय मिश्र इस मामले से बरी हो गए थे। इसका बाद उसका नाम इलाहाबाद से विधायक नंद गोपला गुप्ता उर्फ नंदी पर बम फेंकने के मामले में आया था। जिसमें विजय मिश्रा को जेल भी जाना पड़ा था।

हरिशंकर तिवारी
पूर्वांचल में राजनीति का अपराधीकरण गोरखपुर से शुरू हुआ था तो हरिशंकर तिवारी इसके सबसे बड़े अगुवा थे। एक जमाने में पूर्वांचल की राजनीति में तिवारी की तूती बोलती थी। रेलवे से लेकर पीडब्लूडी की ठेकेदारी में हरिशंकर का कब्जा था। उसके दम पर तिवारी ने एक बहुत बड़ी मिल्कियत खड़ी कर दी। उनके बारे में यह भी कहा जाता है कि जेल में रहकर चुनाव जीतने वाले वह पहले नेता थे। उनको ब्राह्मणों का भी नेता माना जाता है।