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फ्रांस के रोमैन ने काशी में प्राप्त की तंत्र विद्या की दीक्षा और हो गए रामानंद

-आचार्य वागीश शास्त्री से ली तंत्र की दीक्षा

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आचार्य वागीश शास्त्री से तंत्र विद्या की दीक्षा लेते फ्रांसीस रोमैन

आचार्य वागीश शास्त्री से तंत्र विद्या की दीक्षा लेते फ्रांसीस रोमैन

वाराणसी. सर्व विद्या की राजधानी काशी में आज भी विदेशों से लोग प्राच्य विद्या सीखने आते हैं। एक से बढ कर एक मनीषी यहां हैं। अब चाहे वेद-पुराण हो या तंत्र साधना, हर विधा के ज्ञान का भंडार है इस काशी में। यही वजह है कि वाराणसी विदेशियों के आकर्षण का केंद्र है। कुछ नया सीखने की ललक विदेशियों को बनारस खींच लाती है। अब फ्रांस के रोमैन भी यह सोच कर काशी आए और मिले पद्मश्री आचार्य वागीश शास्त्री से। फिर क्या था शास्त्री जी ने उन्हें शिव मंत्र की तांत्रिक दीक्षा दी।

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रोमैन ने बताया कि भारतीय धर्म और संस्कृति में उनकी बहुत गहरी आस्था काफी पहले से रही है। छह माह पूर्व गुरुदेव से कुण्डलिनी जागरण का प्रशिक्षण प्राप्त किया और उसके अभ्यास के बाद काफी शांति और ऊर्जा महसूस हुई। पुनः आने पर मैंने मंत्र दीक्षा ग्रहण करने का अनुरोध किया और गुरूजी ने आशीर्वाद दिया। मंत्र दीक्षा के बाद मेरा नाम रामानंद नाथ हो गया और उनका गोत्र भी परिवर्तित हो गया। कहा कि मैं अपने को बहुत ऊर्जावान और शक्ति से भरा महसूस कर रहा हूं।

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वाग्योग चेतनापीठ शिवाला में के गुरु वागीश शास्त्री ने बताया की तंत्र और मंत्र दोनों का संजोग करके मंत्र दीक्षा प्रदान की जाती है। वर्षों से पाश्चात्य देशों के लोग ज्ञान-आध्यात्म और शांति की खोज में मेरे पास आते हैं और मैं ईश्वर की कृपा से उनको उस मार्ग पर जाने का रास्ता निर्देशित करता हूं। यह मार्ग भाव भक्ति और साधना का है और बिना समर्पण के कोई इस मार्ग पर नहीं जा सकता है।

दीक्षा प्रक्रिया का प्रारम्भ गणेश-अम्बिका, सप्त घृत मातृका और नवग्रह पूजन से प्रारम्भ हुआ। गुरुपूजन, मंत्रदीक्षा और हवन की पूर्णाहुति के साथ संपन्न हुआ। पौरीहित्य कार्य पं शम्भुनाथ पांडेय ने करवाया।
संस्था के सचिव आशापति शास्त्री ने बताया की गुरूजी से मंत्र दीक्षा और कुण्डलिनी जागरण के लिए लोग लालायित रहते हैं लेकिन गुरुदेव योग्य और भाव से समर्पित व्यक्तियों को ही दीक्षा देते हैं। अब तक देश विदेश मैं तकरीबन सैकड़ों से अधिक शिष्य इस विधि से साधना कर रहे हैं।