
समाजवादियों की जुटान
डॉ अजय कृष्ण चतुर्वेदी
वाराणसी. देश के प्रमुख समाजवादी डॉ राममनोहर लोहिया के नेतृत्व में 1959 में अग्रेजी के खिलाफ समूचे उत्तर भारत में मुखर विरोध शुरू हुआ। धीरे धीरे करते करते इसकी लपट बनारस तक पहुंची। बनारस डॉ लोहिया के आंदोलन का प्रमुख केंद्र बना। 29 नवंबर 1967 में इसी बनारस के रत्नाकर पार्क के पास गोलियां बरसाई गईं आंदोलनकारियों पर। उस गोलीबारी में एक आंदोलनकारी की मौत भी हो गई थी। आंदोलन इस कदर बढा कि तीन जनवरी 1968 को जब विज्ञान कांग्रेस में भाग लेने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी बीएचयू पहुंची तो उन्हें काला झंडा दिखाया गया। अब उस आंदोलन को एक बार फिर से ताजा करने की जरूरत महसूस की है लोहियावादियों ने। इसी के तहत उन्होंने अंग्रेजी हटाओ आंदोलन की स्वर्ण जयंती मनाने का फैसला किया है। यह जानकारी प्रमुख लोहियावादी योगेंद्र नारायण शर्मा ने पत्रिका को दी।
शर्मा ने बताया कि इस संबंध में दुर्गाकुंड स्थित दुर्गाकुंड स्थित आनंद पार्क में 50 साल पहले के आंदोलन से जुड़े समाजवादी जुटे। विषद चर्चा में यह बात सामने आई कि इस आधी शताब्दी में अंग्रेजी का प्रभुत्व ज्यादा बढ़ा है। कमजोर तबके के युवक खुद को पिछड़ा मानने लगे हैं। उनके अंदर कुंठा के भाव पैदा हो रहे हैं। अभिभावक इस दबाव में अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में भेजने को विविश हैं जबकि इसके एवज में उन्हें मोटी रकम खर्च करनी पड़ रही है। उन्होंने बताया कि लोगों के चर्चा के केंद्र में यह रहा कि भले ही डॉ लोहिया ने अंग्रेजी का विरोध 1959 में शुरू किया और उसकी आग 1967 में बनारस पहुंची और बनारस अंग्रेजी हटाओ आंदोलन का केंद्र बन गया। लेकिन आज उससे कहीं ज्यादा विकराल स्थिति आ गई है। ऐसे में जरूरत आज भी उसी तरह के आंदोलन को खड़ा करने की है। ऐसे में अंग्रेजी हटाओ आँदोलन की स्वर्ण जयंती मनाने का फैसला लिया गया।
आनंद पार्क, दुर्गाकुंड में हुई बैठक में जुटे भाषा आंदोलन के सेनानियों, वरिष्ठ पत्रकारों, लेखकों, अध्यापकों और विश्वविद्यालय के छात्रों ने कहा कि बीते 50 वर्षों में अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ा है तथा शिक्षा, प्रशासन, न्यायपालिका में इस कारण अयोग्यता बढ़ी है। अंग्रेजी न जानने वाले युवकों के प्रति उपेक्षा से शोषणकारी व्यवस्था निर्माण हुआ है। इसकी तुलना जातिगत शोषण से की जा सकती है। माध्यम के रूप में अंग्रेजी चलाने वाले स्कूल शिक्षा के व्यावसायीकरण के भी प्रतीक बन गए हैं। उच्च न्यायपालिका में भारतीय भाषाओ की उपेक्षा और निषेध के कारण अधिकांश नागरिकों के लिए बहस और फैसले समझ से परे होते हैं। प्रदेश की न्यायिक सेवा की चयन प्रक्रिया में अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ाने के विरुद्ध इलाहाबाद स्थित राज्य लोक सेवा आयोग के समक्ष आयोजित विरोध प्रदर्शन को पूर्ण समर्थन देने का फैसला लिया गया।
वक्ताओं ने बताया कि भाषा आंदोलन को देश के मूर्धन्य साहित्यकारों, वैज्ञानिकों, लेखकों और बुद्धिजीवियों का समर्थन मिला था। स्वर्ण जयंती के उपलक्ष्य में साहित्य प्रकाशन, संगोष्ठी के अलावा पुन: एक व्यापक आंदोलन चलाने का संकल्प लिया गया। बैठक की अध्यक्षता वरिष्ठ समाजवादी विजयनारायण ने की।
बैठक में ये थे मौजूद
बैठक में मुख्य तौर पर डॉ. विजय बहादुर सिंह, योगेंद्र नारायण शर्मा, प्रदीप श्रीवास्तव, राम दयाल पाल, प्रो सुरेंद्र प्रताप, प्रो महेश विक्रम, डॉ सरोज कुमार, डॉ स्वाति, डॉ नीता चौबे, वशिष्ठ मुनि ओझा, कुंवर सुरेश सिंह, विजेंद्र मीना, अशोक श्रीवास्तव, श्याम बाबु मौर्य, गणेश चतुर्वेदी तथा डॉ प्रभात महान थे। बैठक में अफलातून को तैयारी समिति का संयोजक नियुक्त किया गया।
Published on:
04 Dec 2017 08:57 pm
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