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वाराणसी. सीएम योगी आदित्यनाथ के गृह जनपद गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन नहीं मिलने से हुई २६ मौत ने एक फिर सरकारी व्यवस्था की कलई खोल दी है। मरीजों के जान बचाने में काम आने वाली ऑक्सीजन के लिए अलग से बजट तक का प्रावधान नहीं है। सरकारी अस्पातलों की स्थिति इतनी खराब है कि उधार के ऑक्सीजन से मरीजों की सांस चलती है। यदि व्यवस्था में जल्द बदलाव नहीं हुआ तो अन्य किसी सरकारी अस्पताल में गोरखपुर वाली घटना घट सकती है।
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शासन से सरकारी अस्पतालों के लिए बजट निर्धारित किया जाता है। इसमे दवाई, डीजल आदि मद निर्धारित रहते हैं, लेकिन ऑक्सीजन जैसे जरुरी चीज के लिए कोई बजट निर्धारित नहीं किया गया है। अस्पताल प्रशासन स्तर से ही ऑक्सीजन की खरीदारी होती है। अस्पताल में ऑक्सीजन की खपत को लेकर कोई पूर्वानुमान तक नहीं होता है इसलिए ऑक्सीजन की खरीदारी घटती-बढ़ती रहती है। शासन ने अस्पताल प्रशासन को जब सामान्य बजट मिलता है तो उसी पैसे से ऑक्सीजन का भुगतान किया जाता है। अस्पताल के अधिकारी या फिर कर्मचारी अपने व्यवहार से ऑक्सीजन की उपलब्धता सुनिश्चित करते हैं। उधारी ऑक्सीजन मंगाया जाता है और जब बजट आता है तो उधारी चुकायी जाती है। यदि बजट नहीं मिला और ऑक्सीजन सप्लाई वाली फर्म ने ऑक्सीजन नहीं दिया तो मरीजों की जान बचाना कठिन हो जायेगा।
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ऑक्सीजन के लिए तीन लाख से अधिक का होता है भुगतान
शिवप्रसाद गुप्त मंडलीय अस्पताल, जिला महिला अस्पताल, दीनदयाल राजकी अस्पताल की ही बात की जाये तो यहां पर साल भर में ऑक्सीजन पर तीन लाख से अधिक का खर्च होता है। सभी जगहों पर उधार की ऑक्सीजन मंगायी जाती है और फिर बजट मिलने पर भुगतान होता है।
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सरकारी अस्पतालों में सेंट्रलाइज सिस्टम व सिलेंडर के जरिए ऑक्सीजन की सप्लाई की जाती है। सरकारी अस्पताल में लापरवाही का बोलबाला रहता है, जिसके चलते ऑक्सीजन लगाने के बाद परिजन अपने मरीजों का ध्यान नहीं रखे तो मामला बिगड़ सकता है। सेंट्रलाइज सिस्टम के पाइप में लीकेज के चलते भी ऑक्सीजन वक्त से पहले खत्म होती है। ऑक्सीजन देने वाले नॉब के पास ही मीटर लगा होता है, जिससे पता चलता है कि सिस्टम में कितनी ऑक्सीजन बची हुई है।
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ऑक्सीजन सप्लाई में होता है जमकर खेल
सरकारी अस्पतालों में ऑक्सीजन की सप्लाई के नाम पर जमकर खेल होता है। ऑक्सीजन टैंक या सिलेंडर की माप किलो में होती है। सूत्रों की माने तो भ्रष्टाचार के चलते सिलेंडर में कम ऑक्सीजन की सप्लाई की जाती है, और बाद में रिकॉर्ड में लिख दिया जाता है कि मरीजों को ऑक्सीजन सप्लाई करने में सिलेंडर खाली हो जाता है। अधिकारी से लेकर कर्मचारी तक ऑक्सीजन के नाम पर अपनी जेब गरम करने का मौका नहीं छोड़ते हैं।
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Updated on:
11 Aug 2017 08:37 pm
Published on:
11 Aug 2017 08:34 pm
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