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Gyanvapi Carbon Dating: जानें क्या है कार्बन डेटिंग, क्यों होगा ज्ञानवापी में इसका उपयोग?

Gyanvapi Carbon Dating: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ज्ञानवापी में कथित शिवलिंग की कार्बन डेटिंग जांच और साइंटिफिक सर्वे की मांग को लेकर दाखिल याचिका स्वीकार कर ली है। आइए अपको बताते हैं क्या है कार्बन डे‌टिंग?

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क्या होती है कार्बन डेटिंग?
कार्बन डेटिंग से वस्तुओं की उम्र का पता लगाया जाता है। जिसमें कार्बन के अवशेष होते हैं, उससे यह पता लगाया जाता है कि कितनी साल पुरानी है। ज्ञानवापी परिसर में मिले कथित शिवलिंग की कार्बन डेटिंग की मांग की थी। बनारस की डिस्ट्रिक्ट कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने डिस्ट्रिक्‍ट कोर्ट के आदेश को पलट दिया।

क्या होती है कार्बन डेटिंग की विधि?
पृथ्वी के वायुमंडल में कार्बन के तीन आइसोटोप होते हैं। ये कार्बन- 12, कार्बन- 13 और कार्बन- 14 के नाम से जाने जाते हैं। कार्बन डेटिंग में कार्बन-12 और कार्बन 14 के बीच का अनुपात निकाला जाता है। जब किसी जीव की मौत होती है तब ये वातावरण से कार्बन का आदान प्रदान बंद कर देते हैं।

जिसकी वजह से कार्बन- 12 से कार्बन- 14 के अनुपात में अंतर होने लगता है। यानी कि कार्बन- 14 का क्षरण होने लगता है। इसी अंतर से किसी भी वस्तु के बारे में पता लगाया जाता है कि वह कितना पुराना है।


पत्थरों की उम्र का कैसे पता लगाया जा सकता है
कार्बन डेटिंग से केवल 50 हजार साल पुराने वस्तुओं के बारे में पता लगाया जा सकता है। पत्थर और चट्टानों की आयु इससे ज्यादा भी हो सकती है। अब सवाल उठता है कि उसके उम्र का पता कैसे लगेगा। इसे इनडायरेक्ट तरीके से भी पता लगाया जा सकता है। कार्बन डेटिंग के लिए किसी पत्थर का कार्बन- 14 का होना जरूरी है। अगर ये चट्टान पर न भी मिले तो इस पर मौजूद रेडियोएक्टिव आइसोटोप से इसकी उम्र का पता लगाया जा सकता है।


1949 में हुई थी कार्बन डेटिंग की खोज
कार्बन डेटिंग के विधि की खोज 1949 में हुई थी। अमेरिका के शिकागो यूनिवर्सिटी के विलियर्ड फ्रैंक लिबी और उनके साथियों ने इसका अविष्कार किया था। उनकी इस उपलब्धि के लिए उन्हें 1960 में रसायन का नोबल पुरस्कार दिया गया था। कार्बन डेटिंग की मदद से पहली बार लकड़ी की उम्र पता की गई थी।


अब जान लीजिए विवाद और कार्बन डेटिंग के इस्तेमाल की वजह
ज्ञानवापी विवाद को लेकर हिंदू पक्ष का दावा है कि इसके नीचे 100 फीट ऊंचा आदि विश्वेश्वर का स्वयंभू ज्योतिर्लिंग है। काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण करीब 2050 साल पहले महाराजा विक्रमादित्य ने करवाया था, लेकिन मुगल सम्राट औरंगजेब ने साल 1664 में मंदिर को तुड़वा दिया।

दावे में कहा गया है कि मस्जिद का निर्माण मंदिर को तोड़कर उसकी भूमि पर किया गया है जो कि अब ज्ञानवापी मस्जिद के रूप में जाना जाता है। कार्बन डेटिंग में अगर कथित शिवलिंग उस समय के आसपास का पाया जाता है तो यह इस मामले में बड़ी कामयाबी होगी।