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Gyanvapi Case : ज्ञानवापी मस्जिद परिसर के सर्वे और सिविल वाद की वैधता मामले में हाईकोर्ट में सुनवाई टली, 14 जुलाई अगली तारीख

Gyanvapi Case : ज्ञानवापी मस्जिद के वजूखाने में मिले कथित शिवलिंग के सर्वे पर सुप्रीम कोर्ट ने अंतिरम रोक लगा रखी है। इस मामले में अगस्त माह में अब सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होगी। वहीं हिन्दू पक्ष ने सिविल कोर्ट में ज्ञानवापी परिसर के सर्वे से सम्बंधित याचिका डाली है, जिसपर सुनवाई हो रही है।

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Gyanvapi Case

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न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया ने दी तारीख
यूपी सुन्नी सेन्ट्रल वक्फ बोर्ड और अंजुमन इंतेजामिया मसजिद कमेटी के द्वारा दायर याचिकाओं, ज्ञानवापी परिसर का भारतीय पुरात्तव सर्वेक्षण विभाग से सर्वे कराने के वाराणसी की अदालत के आदेश और सिविल वाद की वैधता को लेकर हाईकोर्ट में दायर की है। इसपर शुक्रवार को न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया ने सुनवाई के बाद तारीख दे दी।

समय कम होने से मिली तारीख

कोर्ट में मामला लगने के बाद दोनों मामले में कोर्ट में पेश किए गए। बहस शुरू हुई अभी अभियोजन पक्ष बोल ही रहा था कि समय कम होने की वजह से जज ने बहस को बीच में रोक दिया। लंच का समय हो चुका था लेकिन लंच के बाद कोर्ट न होने की वजह से कोर्ट ने 14 जुलाई की तारीख दी है।

प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 की धारा चार के तहत वाद पोषणीय नहीं

सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड और अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी की याचिकाओं की सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया की अदालत में याचियों की ओर से बहस की गई थी कि प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 की धारा चार के तहत सिविल वाद पोषणीय नहीं है। स्थापित कानून हैं कि कोई आदेश पारित हुआ है और अन्य विधिक उपचार उपलब्ध नहीं है तो अनुच्छेद 227 के अंतर्गत याचिका में चुनौती दी जा सकती है। विपक्षी मंदिर पक्ष का कहना था कि भगवान विश्वेश्वर स्वयंभू भगवान हैं। वह मानव द्वारा निर्मित नहीं बल्कि प्रकृति प्रदत्त हैं। उन्होंने इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के एम सिद्दीकी बनाम महंत सुरेश दास व अन्य केस के फैसले का हवाला दिया था।

मुस्लिम पक्ष ने पेश की थी हाईकोर्ट में दलील

24 मई को ही सुनवाई के दौरान मुस्लि पक्ष की ओर से हाईकोर्ट में मुगल बादशाह औरंगजेब को लेकर जो दलील पेश की गई थी, उसे लेकर हिंदू पक्ष की ओर से तीखी प्रतिक्रिया आई थी। सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष ने अदालत में दलील थी कि मुगल शासक औरंगजेब क्रूर नहीं था। उसने ना ही वाराणसी के किसी भगवान आदि विश्वेश्वर के मंदिर को तोड़ा था। मुगल बादशाह के आदेश पर किसी मंदिर के तोड़े अथवा ढहाए जाने के कोई साक्ष्य मौजूद नहीं हैं। वारणसी में दो विश्वनाथ मंदिरों (पुराने और नए) की कोई अवधारणा नहीं थी। घटनास्थल पर जो ढ़ांचा या इमारत मौजूद है, वह वहां हजारों साल से है। वहां कल भी मस्जिद थी और आज भी मस्जिद है।


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