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ये है काशी की गंगा जमुनी तहज़ीब, ईद पर मिठास घोलने में जुटे हैं हिंदू परिवार

40 वर्ष से चल रहा है यह सिलसिला। पूरा मोहल्ला बनाता है सेवई, पूरे देश में है डिमांड।

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सेवई

सेवई

वाराणसी. गंगा जमुनी तहज़ीब की मिशाल यूं ही नहीं दी जाती इस काशी को। अरसे से यहां सांप्रदायिक सौहार्द कायम है। हर पर्व त्योहार मिल जुल कर मनाते हैं हर धर्म के मानने वाले। फिर ऐसा कैसे हो कि ईद की तैयारी में हिंदू परिवार मशगूल न हो। है न, पूरा का पूरा मोहल्ला पिछले एक महीने से जुटा है ईद पर मिठास घोलने में। ये लोग अपने हाथों से तैयार कर रहे हैं सेवई। सब कुछ तैयार हो गया है बस पैकिंग की है तैयारी। सबसे अच्छी बात यह कि जो लोग ईद पर इनसे सेवईं खरीदते हैं वो ईद के दिन अपने यहां सेवईं बना कर उनका भी मुंह मीठा करते हैं। दोनों गले मिलते हैं और एक दूसरे को बधाई देते हैं।

काशी के भदऊं चुंगी इलाके में है सेवई मंडी। यह पूरी तरह से हिंदू बस्ती है। लेकिन वर्षों से यहां के हिंदू परिवार के लोग रमज़ान शुरू होते ही ईद की तैयारी में जुट जाते हैं। ईद पर मिठास घोलने में जुट जाते हैं। महिला-पुरुष सब मिल कर बनाते हैं सेवईं। क्षेत्रीय लोग बताते हैं कि करीब 40 वर्ष से ज्यादा हो गया हम लोगों सेवई बनाते। सेवईं बनाने का सिलसिला रमज़ान शुरू होते ही आरंभ हो जाता है। छत पर लोहे के एंगल या बांस पर सेवई को सुखाया जाता है। यह कारोबार पीढ़ियों से चल रहा है।

इन हिंदुओं द्वारा बनाई जाने वाली सेवईं का तौर तरीका कुछ अलग है। ये लोग महीन, मध्यम और मोटी तीन तरह की सेवइयां बनाते हैं। इसके चलते इनके हाथ की बनी सेवईं की मांग न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि महाराष्ट्र, राजस्थान, गुजरात समेत कई अन्य प्रांतों में भी है। व्यापारियों का कहना है कि अब धीरे-धीरे हर जगह यहां की सेवइयां मशहूर हो रही है क्योंकि जो क्वालिटी यहां की सेवइयों में मिलती है, वह कहीं और नहीं मिलती। इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि आज भी बनारस के इस मोहल्ले में अधिकांश घरों में सेवइयों का निर्माण हाथों से होता है न की मशीन से, जिसके कारण इनका स्वाद दूसरे जगह की सेवइयों से कुछ अलग होता है।