
लक्ष्मी कुंड जिसका प्राचीन इतिहास है कुंड के किनारे लक्ष्मी माता का मंदिर है जिसका उल्लेख धर्मग्रंथों में मिलता है और वासंतिक नवरात्र में नौ गौरियों के दर्शन के क्रम में मां लक्ष्मी के दर्शन-पूजन का जो जिक्र आता है वह यही लक्ष्मी माता हैं। यहां 16 दिन तक चलने वाला सोरहिया का मेला लगता है। लक्ष्मी मंदिर में ही सोरहिया माता का विग्रह भी है। यह मेला कुछ ही दिनों में शुरू होने वाला है। सौभाग्य व समृद्धि और संतति की कामना पूर्ति के लिए महिलाएं और पुरुष दोनों ही 16 दिन तक अनुष्ठान करते हैं। अंतिम दिन इसी कुंड पर जीवित पुत्रिका व्रत (जिउतिया) का मेला लगता है। पूर्वांचल में खर जिउतिया व्रत का काफी महात्मय है। ये इसी कुंड पर लगता है।

इसी कुंड पर साल भर आस-पास के लोग पितरों का श्राद्ध करते हैं। जिस भी घर में किसी का निधन होता है तो श्मशान पर अंत्येष्ठी के दूसरे दिन कुंड पर स्थित पीपल के वृक्ष में घंट बांधा जाता है। पितरों का अर्पण-तर्पण करने वाले इसी कुंड के जल का इस्तेमाल करते हैं। 10 दिन तक रोजना सुबह-शाम पितरों को जल देने के अलावा दशगात्र, एकादशाह और द्वादशाह का कर्मकांड इसी कुंड पर होता है। मान्यता के अनुसार इस कर्मकांड के लिए शुद्ध जल चाहिए पर हासिल वह काईयुक्त गंदा पानी ही होता है।

गंगा में प्रतिमाओं के विसर्जन पर लगी रोक के बाद यही वो कुंड है जहां शारदीय नवरात्र में पंडालों में स्थापित होने वाली दुर्गा प्रतिमाएं, गणेशोत्सव के बाद गणेश प्रतिमाएं, काली पूजा के बाद मां काली की प्रतिमाएं, सरस्वती पूजनोत्सव के बाद वाग्देवी की प्रतिमाओं का अब विसर्जन भी होने लगा है।

कुंड की ऐतिहासिकता, उसके महत्व और प्राचीन परंपरा को देखते हुए ही इसके उद्धार का फैसला लिया गया। इसे हृदय योजना में शामिल किया गया। उद्धार के क्रम में कुंड के चारों तरफ शानदार रेलिंग लगाई गई। कुंड के चारों तरफ हेरिटेज लाइट लगाई गई। कुंड में पांच फौव्वारे भी लगे हैं। लेकिन सब कुछ नगर निगम की लापरवाही की भेंट चढ़ चुका है। कुंड के उत्तर दिशा में जहां पितरों का अर्पण-तर्पण होता है और जहां घंट बांधा जाता है उसकी साफ-सफाई का जिम्मा एक स्थानीय व्यक्ति के पास है जो श्राद्ध कर्म करने आने वालों की श्रद्धा से प्राप्त धनराशिस झाड़ू आदि खऱीदते हैं। कुंड में मोटी काई जमा है जिसकी सफाई पर किसी का ध्यान नहीं।

कुंड के चारों तरफ लगी हेरिटेज लाइट अब जलती नहीं। जले भी तो कैसे, उसमें बल्ब ही नहीं है। बल्ब तो दूर होल्डर तक गायब हैं। बिजली का कनेक्शन तक अब नहीं रहा। बिजली के तार तो अब भूमिगत हो चुके हैं लिहाजा दिखते नहीं ऐसे में इसका पता तो बिजली विभाग ही लगा सकता है। लेकिन जब प्रधानमंत्री खुद इस कुंड का नाम लेकर कुछ कहते हैं तब तो स्थानीय जनप्रतिनिधियों और स्थानीय प्रशासन को इस पर गौर फरमाना ही चाहिए। लेकिन ऐसा है नही।