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गंगा में कूदकर भागा वारेन हेस्टिंग्स!

-अमृत महोत्सव के तहत "ग़दर बनारस" नाटक का राजा चेत सिंह घाट पर हुआ मंचन

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राजा चेत सिंह घाट पर स्वातंत्र्य आंदोलन के एक दृश्य का मंचन

राजा चेत सिंह घाट पर स्वातंत्र्य आंदोलन के एक दृश्य का मंचन

वाराणसी. विभिन्न कथाओं और मुहावरों के जरिए जिस तरह से स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास का वर्णन किया गया है, उससे नई पीड़ी पूरी तरह से अनजान है। अपने आसपास अतीत में क्या घटा उसकी जानकारी भी बहुतेरे लोगों को नहीं मालूम। स्वातंत्र्य आंदोलन के उन अनछुए पहलुओं को प्रहसनों के जरिए जीवंतता प्रदान कर नई पीढी को उसके इतिहास से परिचित कराने का बीड़ा उठाया है काशी के घाटवाक विश्वविद्यालय ने। इसी के तहत स्वतंत्रता आंदोलन की काशी से जुड़ी अनोखी कड़ी को प्रस्तुत किया गया चेत सिंह घाट पर, जिसके माध्यम से लोगों को बताया गया कि किस तरह से राजा चेत सिंह की पराक्रम से डर कर वारेन हेस्टिंग गंगा में कूद कर काशी से चुनार भाग निकला।

अंतर्राष्ट्रीय काशी घाटवाक विश्वविद्यालय के तत्वावधान में आजादी के अमृत महोत्सव के अंतर्गत बनारस के प्रसिद्ध चेतसिंह घाट पर सुपरिचित लोक कलाकार अष्टभुजा मिश्र के निर्देशन में 'ग़दर बनारस में ' नाम से नौटंकी शैली में एक नाटक का मंचन किया गया। चेतसिंह से शुरु होकर मंगल पांडेय ,लक्ष्मीबाई, शहीद चंद्रशेखर से होता हुआ यह नाटक बनारस के पत्र 'रणभेरी' तक की यात्रा करता है जिसमें काशी में विविध काल खंड में हुए साम्राज्यवादी विद्रोह को दिखाया गया। इसमें जिस समय रात के अंधेरे में चुपके से हेस्टिंग गंगा में नाव से चुनार के लिए भागता है उस समय चेत सिंह की जय से पूरा घाटवाक परिसर गूंज उठा।

संवाद शैली में सम्पन्न इस इस नाटक में चेत सिंह की भूमिका में निखिल, नन्हकू सिंह की भूमिका में अष्टभुजा मिश्र, मार्केहम की भूमिका में विक्रांत शर्मा, हेस्टिंग की भूमिका में आयुष वार्ष्णेय, चंद्रशेखर की भूमिका में हर्षित सिंह, मंगल पांडेय की भूमिका में शशि यादव, संपूर्णानंद की भूमिका में रवि कांत मिश्र, झांसी की रानी की भूमिका में ऋतु सिंह, भारत माता की भूमिका में गौरी मिश्र, नट नर्तक की भूमिका में मुकुन्दी लाल, सिपाही की भूमिका में संतोष निगम और नटी तथा सूत्रधार की भूमिका में नेहा वर्मा व अष्टभुजा मिश्र ने बखूबी अपने पात्र को जीवंत किया। वादकों में हारमोनियम पर रोशन लाल, नक्कारा पर सूरज बलि और ढोलक पर विक्रम विंद ने अपनी छाप छोड़ी।

इस अवसर पर उपस्थित कलाकारों व दर्शकों को संबोधित करते हुए घाटवाक विश्वविद्यालय के संस्थापक प्रसिद्ध न्यूरोलॉजिस्ट प्रो. विजय नाथ मिश्र ने कहा कि आजादी के अमृत महोत्सव में अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझने के लिए इस नाटक के मंचन का महत्व सर्वाधिक है। काशी का चेत सिंह घाट बनारस के इत्तिहास का वह स्वर्णिम पक्ष है जहां से औपनिवेशिक सत्ता के प्रति बनारस के विद्रोह का पता चलता है।

घाटवाक विश्वविद्यालय के मानद डीन व प्रसिद्ध साहित्यकार प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल ने कहा कि चेत सिंह घाट पर नाटक का मंचन कर हमने न केवल वारेन हेस्टिंग के पलायन को दिखा सके हैं बल्कि नई पीढ़ी को यह भी बताने में सफल हुए हैं कि बनारस पर बाद में अंग्रेजों का कब्जा यहां के कुबरा व चेतराम जैसे दगाबाजों के कारण ही संभव हुआ। चेत सिंह घाट का इतिहास हमें बनारस की जनता व यहां के नन्हकू सिंह जैसे पहलवानों की वीरता की याद दिलाता है । यह घटना हमें यह भी याद दिलाती है कि अगर बेनीराम जैसे गद्दार ने हेस्टिंग का साथ न दिया होता तो हेस्टिंग बनारस में ही मारा गया होता और तब काशी का इतिहास कुछ और होता।

इस अवसर पर प्रो बाला लखेंद्र,संजय सिंह, सुनीता शुक्ल, शेफाली आभा मिश्रा, अरुणा, डॉ महेंद्र कुशवाहा, अभिषेक गुप्ता,अवनींद्र कुमार सिंह, अक्षर पाठशाला के गोविंद सिंह, कविता, जितेंद्र कुशवाहा, देवेंद्र दास, गोविंद सिंह संग दर्शकों का बड़ा हुजूम मौजूद रहा। संचालन वाचस्पति उपाध्याय ने किया जबकि शिव विश्वकर्मा ने आभार जताया।