
ट्रीटमेंट प्लांट
वाराणसी. गंगा प्रदूषण पर अंकुश लगाने के लिए उत्तर प्रदेश की टेनरियों को बंद करने या उन्हें अन्यत्र विस्थापित करने की जरूरत नहीं है। बल्कि कुछ आसान से उपाय हैं जिन्हें अमल में ला कर उन्हें उनके स्थान पर रहते हुए भी गंगा को औद्योगिक कचरों से मुक्त रखा जा सकता है। बता दें कि हाल ही में आईआईटी बीएचयू ने केंद्र सरकार के आग्रह पर केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के अध्यक्ष प्रो. पीके मिश्रा के नेतृत्व में आईआईटी के कई विभागों के विशेषज्ञों और शोध छात्रों टीम ने कानपुर में रहकर टेनरियों की जांच के साथ जमीनी हकीकत का जायजा लिया। सूत्रों के मुताबिक तमाम तरह की जांच के बाद सरकार को भेजी गई रिपोर्ट चौंकाने वाली है। खतरनाक प्रदूषण के लिए सिर्फ इंडस्ट्री जिम्मेदार नहीं,बल्कि कॉमन एफ्ल्युएंट ट्रीटमेंट प्लांट (सीईटीपी) और क्रोम रिकवरी प्लांट का सही ढंग से संचालन न होने के कारण इसे भी प्रमुख कारण बताया गया है। सर्वे टीम ने पाया कि बगैर सीईटीपी से बगैर ट्रीट किए वेस्ट को गंगा में धड़ल्ले से छोड़ा जा रहा है। ऐसे में आईआईटी बीएचयू के विशेषज्ञों ने केंद्र सरकार को कुछ सुझाव भेजे हैं। जानते हैं क्या हैं वो सुझाव...
सूत्रों की मानें तो केंद्र सरकार को भेजी गई रिपोर्ट में टेनरियों को उजाड़ने की जगह प्रदूषण रोकने के लिए नए सिरे से काम करने की सलाह दी गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि जहां भी टेनरियों को विस्थापित किया जाएगा वहां से उनका कचरा किसी न किसी नदी या नाले के जरिए गंगा में पहुंचेगा। फिर इस तरह से प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण नहीं हो सकेगा। टेनरियों के अलावा कानपुर के गंगा स्ट्रेच में सीवेज से होने वाले प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण के लिए आईआईटी बीएचयू के विशेषज्ञों ने कुछ उपाय सुझाए है। इसमें बिठुर बैराज से लेकर पांडु और गंगा के संगम स्थल तक समानांतर नहर बनाने और आज के दौर के मशीन-मैन पावर और बिजली से चलने वाले सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की जगह नेचुरल प्रॉसेस पर आधारित रीड बेड सीवेज ट्रीटमेंट और बॉयो डायजेस्टर को कहीं ज्यादा उपयोगी बताया है। कहा है कि इसमें ट्रीटमेंट के लिए मशीन की जगह खास तरह के पेड़ों का प्रयोग होता है। टेनरी वेस्ट और सीवेज के लिए करीब15 किलोमीटर लंबी और 50 मीटर चौड़ी नहर बनाने की बात कही गई है। कहा गया है कि टेनरियों में लगे बेसिक ट्रीटमेंट पलांट को अपग्रेड करने के साथ उनपर कड़ी नजर रखा जाना चाहिए ताकि टेनरियों का वेस्ट सीधे नहर में न आ सके।
20 लाख लोगों को मिल रहा इन लेदर इंडस्ट्रीज से रोजगार
बता दें कि कानपुर की लेदर इंडस्ट्री प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रुप से करीब 20 लाख लोगों को रोजगार दे रही है। लेकिन इसके चलते गंगा प्रदूषित हो रही हैं। इस कारण नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने कड़ा रूख अपनाया है। टेनरियों से गैर शोधित औद्योगिक कचरा और जहरीले एफ्लुएंट नदी में जाने को देखते हुए टेनरियों को हटाने के सरकार के इरादे का पता चलने से इंडस्ट्री में हड़कंप मचा है। टेनरियों का भविष्य तय करने को सरकार ने इससे होने वाले प्रदूषण की मुकम्मल जांच आईआईटी बीएचयू के केमिकल इंजीनियरिंग विभाग से कराई है। देश के बाकी हिस्सों के इंडस्ट्रियल कलस्टर की भी जांच चल रही है। इनका जिम्मा अन्य आईआईटी के साथ लेदर इंस्टीट्यूट (चेन्नई) को मिला है।
कानपुर की टेनरियों की हकीकत
- सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 400 और गैर सरकारी आंकड़ों के अनुसार करीब 700टेनरियां हैं।
-लेदर इंडस्ट्री से प्रत्यक्ष तौर पर 2 लाख लोगों को रोजगार मिलता है।
-अप्रत्यक्ष तौर पर 20 लाख इससे रोजी-रोटी कमा रहे हैं।
-लेदर की टेनिंग में यूज होने वाले कई तरह के केमिकल घातक हैं।
प्रदूषण की स्थिति
-प्रदूषण नियंत्रण को लगा महज 25 साल पुराना 9 एमएलडी का सीईटीपी अपग्रेड नहीं।
-टेनरी वेस्ट को प्लांट तक ले जाने वाले नालों मे सीवेज लाइन भी जुड़ी हैं।
-कुछ टेनरी मालिक रिवर्स बोरिंग कर गंदा पानी सीधे जमीन में डालते हैं।
-कानपुर में 23 नालों से गंगा में सीधे जाता है सीवेज।
-सबसे बड़े सीसामऊ नाले से ही गिरता है 140 एमएलडी गंदा पानी।
-700 एमएलडी डिस्चार्ज के मुकाबले नए बन रहे एसटीपी से सिर्फ 481 एमएलडी ही होगा ट्रीट।
चमड़ा उद्योगों का कारोबार
-6310करोड़ वित्तीय वर्ष2015-16में
-7200करोड़ वित्तीय वर्ष2014-15में
-6500करोड़ वित्तीय वर्ष2013-14में
-2016-17में 6000करोड़ का अनुमान
Published on:
09 Sept 2017 03:43 pm
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