
जंगमबाड़ी मठ
वाराणसी. जंगमवाड़ी मठ वाराणसी के प्राचीनतम मठों में से एक है। लिखित ऐतिहासिक आलेखों के अनुसार यह मठ 8वीं. शताब्दी में निर्मित है। हालांकि इसके निर्माण की सटीक तिथि प्रमाणित करना कठिन है। कहा जाता है कि राजा जयचन्द ने इस मठ के निर्माण के लिए भूमि दान में दी थी। तत्पश्चात यह मठ 86 जगत्गुरुओं की अटूट वंशावली का साक्षी है। इस मठ के वर्तमान गुरु, पीठाधिपति जगत्गुरू श्री चन्द्रशेखर शिवाचार्य महास्वामीजी हैं। इस मठ से सम्बंधित एक सुखद तथ्य यह भी है कि इस मठ में कई गुरुमाएं भी थीं, जिन में धर्मगुरु शर्नम्मा प्रमुख थीं। यह लिंगायत समुदाय से जुड़ा है। ऐसे में सियासी दृष्टि से यह कयास लगाया जाने लगा है कि मिशन यूपी 2022 के तहत ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यहां आए। इतना ही नहीं भाजपा ने सोची समझी रणनीति के तहत येदियुरप्पा को भी आमंत्रित किया।
मठ ज्ञान सिंहासन अथवा ज्ञानपीठ रूप में भी जाना जाता है
यह मठ ज्ञान सिंहासन अथवा ज्ञानपीठ रूप में भी जाना जाता है। इसका अर्थ भी वही है, शिव को जानने वालों का आश्रम अथवा निवास। इस समुदाय के सदस्य केवल शिवलिंग की आराधना करते हैं तथा अन्य किसी देव-दवियों अथवा पंथ की उपासना नहीं करते। वे जाति भेद में भी विश्वास नहीं करते।
शिवलिंगों के संग्रह के पीछे का रहस्य
इसके पीछे की कहानी यह है की कि इस मठ के अनुयायियों की आकस्मिक अथवा अकाल मृत्यु की स्थिति में उनकी आत्मा की शांति हेतु शिवलिंग दान किए जाते हैं। यानी दिवंगत आत्मा की शांति के लिए पिंडदान के स्थान पर विधि-विधान से शिवलिंग दान किया जाता है। सैकड़ों वर्षों से चली आ रही इस विचित्र परंपरा के चलते एक ही छत के नीचे 10 लाख से भी अधिक शिवलिंग स्थापित हो चुके हैं। इनमें से अधिकतर शिवलिंगों का दान श्रावण मास में किया जाता है जब वीर शैव अथवा लिंगायत भक्त दूर सुदूर शिवमंदिरों में पूजा अर्पित करने के लिए तीर्थयात्रा करते हैं।
बताया गया है कि, वो व्यक्ति जो बासवन्ना का अनुसरण करता है, इन रिवाज़ों का पालन नहीं करता और वो शैवों से अलग होता है। वीरशैव पर शैवों का प्रभाव अधिक दिखता है। वो शिव और अन्य देवी-देवताओं में विश्वास करते हैं और हिंदू त्योहारों का पालन करते हैं।
वीरशैव स्थावरलिंग (यानी एक ही जगह पर स्थिर लिंग) की पूजा करते हैं, लेकिन इष्टलिंह को गले में पहना जा सकता है और ये एक जगह पर स्थिर नहीं होता, जब भी किसी लिंगायत को पूजा करनी होती है वो अपने गले के इस शिवलिंग को अपनी हथेली पर रख कर प्रार्थना करता है। वीरशैव और लिंगायतों के बीच ये सबसे प्रमुख और सबसे बड़ा फ़र्क हैं। आपके और ईश्वर के बीच कोई और नहीं होता।
दोनों आस्थाओं के बीच अंतर उल्लेखनीय रूप से तब दिखना शुरू हुआ जब युवा शिक्षित हुए और सामाजिक-आर्थिक विकास के साथ-साथ बासवेश्वरा के वचनों में उनकी रुचि बढ़ने लगी।
जंगमबाड़ी मठ में जिंदा है गुरुकुल परंपरा
जंगमबाड़ी मठ काशी में एक ऐसा मठ है जहां गुरुकुल परंपरा अभी भी जिंदा है। इसे काशी का सबसे प्राचीन मठ माना जाता है। इस मठ में बटुकों को ज्ञान मिलता है और दूर दराज से आने वाले श्रद्धालुओं को काफी सुविधा भी मिलती है। ये सब देश की गुरुकुल परंपरा को जीवंत रखता है। 1918 में जगदगुरु विश्वराध्य गुरुकुल की स्थापना वीर शैव धर्म के पांच पीठों के आचार्यों की देख रेख में हुई।
अधिकतर अनुयायी महाराष्ट्र एवं कर्नाटक से आते हैं
जंगम अर्थात शिव को जानने वाला तथा वाड़ी का अर्थ है रहने का स्थान। यह एक अतिविशिष्ट मठ है जिसके अनुयायी अधिकतर महाराष्ट्र एवं कर्नाटक से आते हैं। वीर शैव सिद्धांत का पालन करने वाले ये आराधक केवल शिवलिंग की ही आराधना करते हैं। शिवलिंग के प्रति इनकी आस्था एवं निष्ठा अपरंपार है। इसका अनुभव करने के लिए इस मठ का दर्शन करना आवश्यक है।
भाजपा ने बनारस से दूर की चाल चली है जो कांग्रेस के लिए मुश्किलें पेश कर सकती है
बता दें कि येदियुरप्पा कर्नाटक लिंगायत समुदाय से आते है जो पूरे कर्नाटक में एक अगड़ी जाति मानी जाती है और उत्तर कर्नाटक में तो एक प्रभावशाली वोट बैंक है। वहीं कांग्रेस पार्टी 1990 से ही लिंगायत समुदाय की नाराज़गी झेल रही है, जब तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राजीव गांधी ने उनके नेता वीरेंद्र पाटिल को मुख्यमंत्री पद से हटाया था। ऐसे में राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यूपी में 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव की दृष्टि से लिंगायत समुदाय को अपने पाले में कर भाजपा ने बनारस से दूर की चाल चली है जो कांग्रेस के लिए मुश्किलें पेश कर सकती है।
Published on:
16 Feb 2020 02:30 pm
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