
Jitiya vrat
वाराणसी. जितिया संतान की दीर्घायु और सुख समृद्धि की कामना के लिए रखा जाने वाला व्रत है। इस व्रत को निर्जला रखा जाता है। यह व्रत नहाय खाय की परम्परा के साथ 22 सितम्बर को यानी आज मनाई जा रही है। हिंदू पंचांग के अनुसार, जितिया व्रत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी से नवमी तिथि तक मनाया जाता है। इन क्षेत्रों में यह 21 तारीख शनिवार से अगले दिन रविवार 22 सितंबर तक होगा। इस व्रत में महिलाएं सप्तमी को नहाय-खाय के साथ अष्टमी को निर्जला व्रत रखती हैं और नवमी को पारण यानी भोजन करती हैं।
जीवित्पुत्रिका व्रत का महत्व जीवित्पुत्रिका या जितिया का व्रत हिन्दू धर्म में आस्था रखने वाली महिलाएं संतान की मंगल कामना के लिए करती हैं। मान्यता है कि यह व्रत बच्चों की लंबी उम्र और उनकी रक्षा के लिए किया जाता है। मान्यता है कि इस व्रत की कथा सुनने वाली महिलाओं को भी कभी संतान वियोग नही सहना पड़ता है। साथ ही घर में सुख-शांति बनी रहती है।
जीवित्पुत्रिका व्रत शुभ मुहूर्त
इस बार अष्टमी तिथि 21 सितम्बर रात 08 बजकर 21 मिनट से प्रारंभ हो चुकी है और यह 22 सितम्बर को रात 07 बजकर 50 मिनट तक समाप्त हो जाएगी।
पूजा विधि
जितिया व्रत के पहले दिन महिलाएं सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करके पूजा करती हैं और फिर एक बार भोजन ग्रहण करती हैं और फिर पूरा दिन कुछ भी नहीं खातीं। दूसरे दिन सुबह स्नान के बाद महिलाएं पूजा-पाठ करती हैं और फिर पूरा दिन निर्जला व्रत रखती हैं। व्रत के तीसरे दिन महिलाएं पारण करती हैं। सूर्य को अर्घ्य देने के बाद ही महिलाएं अन्न ग्रहण कर सकती हैं। मुख्य रूप से पर्व के तीसरे दिन झोर भात, मरुवा की रोटी और नोनी का साग खाया जाता है। अष्टमी को प्रदोषकाल में महिलाएं जीमूतवाहन की पूजा करती है। जीमूतवाहन की कुशा से निर्मित प्रतिमा को धूप-दीप, अक्षत, पुष्प, फल आदि अर्पित करके फिर पूजा की जाती है। इसके साथ ही मिट्टी और गाय के गोबर से सियारिन और चील की प्रतिमा बनाई जाती है। प्रतिमा बन जाने के बाद उसके माथे पर लाल सिंदूर का टीका लगाया जाता है। पूजन समाप्त होने के बाद जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा सुननी चाहिए।
ज्यूतपुत्रिका व्रत की कथा
जीवित्पुत्रिका व्रत कथा इस व्रत का संबंध महाभारत काल से जुड़ा है। युद्ध में पिता की मृत्यु के बाद अश्वत्थामा बहुत क्रोधित था। पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए पांडवों के शिविर गया और उसने पांच लोगों की हत्या कर दी। उसे लगा कि उसने पांडवों को मार दिया, लेकिन पांडव जिंदा थे। जब पांडव उसके सामने आए तो उसे पता लगा कि वह द्रौपदी के पांच पुत्रों को मार आया है। यह सब देखकर अर्जुन ने क्रोध में अश्वथामा को बंदी बनाकर दिव्य मणि को छीन लिया। अश्वत्थामा ने इस बात का बदला लेने के लिए अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रही संतान को मारने की योजना बनाई। उसने गर्भ में पल रहे बच्चे को मारने के लिए ब्रह्मास्त्र चलाया, जिससे उत्तरा का गर्भ नष्ट हो गया। लेकिन उस बच्चे का जन्म लेना बहुत जरूरी था। इसलिए भगवान कृष्ण ने उत्तरा की अजन्मी संतान को गर्भ में ही फिर से जीवित कर दिया। गर्भ में मरकर जीवत होने की वजह से इस तरह उत्तरा के पुत्र का नाम जीवितपुत्रिका पड़ गया और तब से ही संतान की लंबी आयु के लिए जितिया व्रत किया जाने लगा।
Published on:
22 Sept 2019 10:29 am
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