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kajri and saawan
गलियां अब भी भीगती हैं लेकिन कजरी की जगह फ़िल्मी गानों ने ले ली है। सिनेमा और सस्ते एल्बमों में गाने वाले न तो उसकी तकनीक को समझ पाते हैं न तो अपनी गायकी से कजरी का रस पैदा कर पाते हैं। हाँ, सावन शुरू होते ही मंगल उत्सवों में शहनाई बजाकर किसी तरह अपना पेट पालने वालों ने अब तक कजरी को जैसे-तैसे जिन्दा कर रखा है।
सावन में गाये जाने वाली कजरी सिर्फ सिर्फ श्रृंगार या प्रेम का गीत नहीं है। इसमें राष्ट्रप्रेम, लोक-चिंतन के साथ साथ प्रकृति प्रेम भी सुनने को मिलता है। एक कजरी जो आज भी बनारस और मिर्जापुर के बच्चों-बच्चों की जुबान पर है, जिसे उस वक्त लिखा गया था जब धनिया नाम की किसी कजरी गायिका का प्रेमी, आजादी की जंग के दौरान रंगून चला गया था पर लौट कर नहीं आया-
रोज-बरोज घरों में कजरी की चौपाल लगा करती थी. लेकिन अब समय बदल गया है। आज की पीढ़ी कजरी के बारे में नहीं जानती. आधुनिकता ने इन अद्भुत उत्सवों की परम्परा को खत्म कर डाला। ”बड़ी खबरें
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