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करवा चौथ 2017: इस विधि करें ये व्रत, जरुर सुने ये कथा, मिलेगा अखण्ड सौभाग्य का वरदान

करवाचौथ व्रत में सरगी का महत्व है, यह घर के बड़ों द्वारा दी गई भेंट होती है जिसमें श्रृंगार के समान के साथ मिठाई फल और मेवे शामिल होते हैं

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Karwa Chauth

करवा चौथ

वाराणसी. करवाचौथ रिश्तों में प्यार की गहराईयों का प्रतीक है। Karva chauth व्रत कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष में पड़ता है। इस साल यह 8 अक्टूबर को मनाया जा रहा। पति की लम्बी उम्र के लिए पत्नियां इस व्रत को करती हैं। यह व्रत सिर्फ सुहागिनों के लिए है। इस व्रत में करवाचौथ के व्रत में शिव, पार्वती, कार्तिकेय, गणेश तथा चंद्रमा का पूजन किया जाता है। इस व्रत की शुरूआत एक दिन पहले सरगी खाने से होती है। कुछ लोग व्रत के एक दिन पहले सरगी खाते हैं और कुछ व्रत वाले दिन सुबह सूर्योदय के पहले इसे खाते हैं। सरगी घर के बड़ों द्वारा दी गई भेंट होती है जिसमें श्रृंगार के समान के साथ मिठाई फल और मेवे शामिल होते हैं।

व्रती जरुर सुने यह कथा
बहुत समय पहले की बात है, एक साहूकार के सात बेटे और उनकी एक बहन थी जिसका नाम करवा था। सभी भाई अपनी बहन से बहुत प्यार करते थे। पहले उसे खाना खिलाते और बाद में स्वयं खाते थे। शादी के बाद एक बार जब उनकी बहन मायके आई हुई थी। तो चतुर्थी के व्रत वाले दिन शाम को जब भाई खाना खाने बैठे तो अपनी बहन से भी खाने का आग्रह करने लगे। बहन ने बताया कि उसका आज उसका व्रत है और वह खाना चंद्रमा को अर्घ्‍य देकर ही खा सकती है।

सबसे छोटे भाई को अपनी बहन की हालत देखी नहीं जाती और वह दूर पेड़ पर एक दीपक जलाकर चलनी की ओट में रख देता है। जो ऐसा प्रतीत होता है जैसे चतुर्थी का चांद हो। उसे देख कर करवा उसे अर्घ्‍य देकर खाना खाने बैठ जाती है। जैसे ही वह पहला टुकड़ा मुंह में डालती है उसे छींक आ जाती है। दूसरा टुकड़ा डालती है तो उसमें बाल निकल आता है और तीसरा टुकड़ा मुंह में डालती है तभी उसके पति की मृत्यु का समाचार उसे मिलता है। वह बेहद दुखी हो जाती है। तब उसकी भाभी सच्चाई बताती है कि उसके साथ ऐसा क्यों हुआ। व्रत गलत तरीके से टूटने के कारण देवता उससे नाराज हो गए हैं। इस पर करवा निश्चय करती है कि वह अपने पति का अंतिम संस्कार नहीं करेगी और अपने सतीत्व से उन्हें पुनर्जीवन दिलाकर रहेगी। वह पूरे एक साल तक अपने पति के शव के पास बैठी रहती है। उसकी देखभाल करती है। उसके ऊपर उगने वाली सूईनुमा घास को वह एकत्रित करती जाती है। एक साल बाद फिर चौथ का दिन आता है, तो वह व्रत रखती है और शाम को सुहागिनों से अनुरोध करती है कि 'यम सूई ले लो, पिय सूई दे दो, मुझे भी अपनी जैसी सुहागिन बना दो' लेकिन हर कोई मना कर देती है। आखिर में एक सुहागिन उसकी बात मान लेती है। इस तरह से उसका व्रत पूरा होता है और उसके सुहाग को नये जीवन का आशीर्वाद मिलता है। इसी कथा को कुछ अलग तरह से सभी व्रत करने वाली महिलायें पढ़ती और सुनती हैं।

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