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शास्त्रीय संगीत संग मिटेगी होली की खुमारी, मां गंगा की लहरों पर जमेगी महफिल, परवान चढ़ेगी काशी की परंपरा

होली के अगले मंगलवार को वर्षों से मनाया जाता है बुढवा मंगल। जानिए क्या है इसका महत्व और इतिहास...

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काशी के घाट

काशी के घाट

वाराणसी. मौज मस्ती के दीवनों की नगरी में मस्ती के अवसरों की कमी नहीं। ये शिव के भक्त जिस अंदाज में किसी पर्व को सोल्लास मनाते हैं ठीक उसी अंदाज में उसकी पूर्णाहुति यानी समापन भी करते हैं। इसी में एक पर्व होली है जिसकी खुमारी उतारने के लिए भी अनोखा उत्सव मनाया जाता है। वह भी गंगा की लहरों पर। मां गंगा की लहरों पर जमती है महफिल, जुटते हैं शास्त्रीय व उप शास्त्रीय संगीत के महारथी। परवान चढ़ती है नृत्य, गीत, संगीत की निशा। मुक्ताकाशीय मंच सजता है बजड़ों पर। जैसे जैसे रात ढलती है यह रंगोत्सव शबाब पर पहुंचता है। खास यह कि इस महफिल में शामिल होने वालों के लिए गुलाबी खुर्राट कुर्ता और धोती के साथ दुलपिया टोपी का परिधान अनिवार्य होता है। शाम के धुंधलके में शुरू होता है यह महोत्सव, एक दूसरे को अबीर गुलाल लगाने के साथ। बताते हैं कि 200 साल से काशी की यह सांस्कृतिक परंपरा काशी और काशीवासियों को जीवंत किए है। इस बार यह मौका आएगा 13 मार्च को।

काशी के पुरनिये बताते हैं कि रंगोत्सव की इस अंतिम कड़ी का इतिहास भी काफी पुराना है। काफी लाजवाब है। वे कहते हैं कि इतिहास गवाह हैं कि 18वीं सदी के उत्तरार्ध तक बुढ़वा मंगल का मेला पूरी तरह जवान था। इसकी रंगीनियों का आकर्षण ब्रितानी हुकूमत के बड़े ओहदेदारों तक को लुभाता रहा। इसकी अनगूंज लंदन के बरमिंघम पैलेस की लॉबी तक थी, 1884 से 1888 के बीच तत्कालीन वायसराय लार्ड डफरिन की पत्नी लेडी डफरिन कई बार बनारस आईं और बुढ़वा मंगल के रौनक की साक्षी बनीं। अपनी मां को लिखी चिट्ठियों में लेडी डफरिन ने उत्सव का जिक्र किया है जिससे पता चलता है कि इसके रंगों को देख वह चमत्कृत थीं।

इस मौके पर होने वाले शास्त्रीय संगीत, नृत्य व वाद्य यंत्रों की तरंगों के बीच पल-पल भींगती रंगीनी। फूलों से मह मह करते बड़ों पर कभी पेट्रोमैक्स की धुंधली रोशनी टिमटिमाती थी, उसकी जगह अब विद्युतीय झालरों ने ले लिया है। रात के नीरव माहौल में जब कभी सितार तो कभी गिटार के तार झंकृत होते हैं, तबले की थाप से नभ भी गुंजायमान हो जाता है। घुंघरुओं की खनक से पूरा वातावरण झनझना उठता है। गायक हों या गायिका, सुरीली आवाजों से चार चांद लगाते हैं। एक तरह से मानों धरती पर स्वर्ग उतर आता है। इन सब के साक्षी होते हैं काशीवासी। एक के बाद एक नर्तकियां बारी-बारी से आतीं और अपने हुनर को पेश करती हैं। बनारस की यह सांस्कृतिक विरासत ही है जो इसे जीवंतता प्रदान करती है। नई ऊर्जा देती है। जीने का सलीका सिखाती है।

तकरीबन 200 वर्ष पुरानी इस परंपरा को इस बार नई ताजगी दी जाएगी मंगलवार 13 मार्च को। अस्सी घाट पर बजड़ों की कतार सजेगी और खास यह कि इसमें इस बार बनारसी सुर सजेंगे। इसमें ख्यात शास्त्रीय गायक डा. राजेश्वर आचार्य, ठुमरी साम्राज्ञी गिरिजा देवी की शिष्या डा. रीता देव की गायकी का रंग जमेगा तो योगेश शंकर शहनाई की तान से गंगा तट की रंगत निखारेंगे। इस उत्सव में संस्कृति विभाग की ओर से चार बजड़े सजाए जाएंगे। शाम छह बजे से होगा इस महाउत्सव का आगाज़।