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नहीं रहे ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कवि केदारनाथ सिंह, साहित्य जगत में शोक की लहर

केदारनाथ सिंह ने बीएचयू से 1956 में हिन्दी में एमए और 1964 में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की थी

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writer kedarnathsingh

kedarnathsingh

वाराणसी. हिंदी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार और कवि केदारनाथ सिंह का सोमवार को दिल्ली में निधन हो गया। यूपी के बलिया जिले के चकिया गांव के रहने वाले केदारनाथ सिंह ने बीएचयू से 1956 में हिन्दी में एमए और 1964 में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की थी। केदारनाथ सिंह के निधन से हिंदी साहित्य जगत में शोक की लहर है।

केदारनाथ सिंह पेट में संक्रमण की शिकायत के बाद पिछले कुछ दिनों से भर्ती थे। सोमवार शाम 8 बजकर 40 मिनट के आसपास उनका निधन हो गया।

केदारनाथ सिंह की कविता बनारस में उन्होंने इस शहर का सजीव चित्रण किया है।

बनारस कविता

इस शहर में वसंत
अचानक आता है
और जब आता है तो मैंने देखा है
लहरतारा या मडुवाडीह की तरफ से
उठता है धूल का एक बवंडर
और इस महान पुराने शहर की जीभ
किरकिराने लगती है

जो है वह सुगबुगाता है
जो नहीं है वह फेंकने लगता है पचखियाँ
आदमी दशाश्‍वमेध पर जाता है
और पाता है घाट का आखिरी पत्‍थर
कुछ और मुलायम हो गया है
सीढि़यों पर बैठे बंदरों की आँखों में
एक अजीब सी नमी है
और एक अजीब सी चमक से भर उठा है
भिखारियों के कटोरों का निचाट खालीपन

तुमने कभी देखा है
खाली कटोरों में वसंत का उतरना !
यह शहर इसी तरह खुलता है
इसी तरह भरता
और खाली होता है यह शहर
इसी तरह रोज रोज एक अनंत शव
ले जाते हैं कंधे
अँधेरी गली से
चमकती हुई गंगा की तरफ

इस शहर में धूल
धीरे-धीरे उड़ती है
धीरे-धीरे चलते हैं लोग
धीरे-धीरे बजते हैं घंटे
शाम धीरे-धीरे होती है

यह धीरे-धीरे होना
धीरे-धीरे होने की सामूहिक लय
दृढ़ता से बाँधे है समूचे शहर को
इस तरह कि कुछ भी गिरता नहीं है
कि हिलता नहीं है कुछ भी
कि जो चीज जहाँ थी
वहीं पर रखी है
कि गंगा वहीं है
कि वहीं पर बँधी है नाव
कि वहीं पर रखी है तुलसीदास की खड़ाऊँ
सैकड़ों बरस से –

कभी सई-साँझ
बिना किसी सूचना के
घुस जाओ इस शहर में
कभी आरती के आलोक में
इसे अचानक देखो
अद्भुत है इसकी बनावट
यह आधा जल में है
आधा मंत्र में
आधा फूल में है
आधा शव में
आधा नींद में है
आधा शंख में
अगर ध्‍यान से देखो
तो यह आधा है
और आधा नहीं भी है

जो है वह खड़ा है
बिना किसी स्‍तंभ के
जो नहीं है उसे थामे है
राख और रोशनी के ऊँचे ऊँचे स्तंभ
आग के स्तंभ
और पानी के स्तंभ
धुएँ के
खुशबू के
आदमी के उठे हुए हाथों के स्तंभ

किसी अलक्षित सूर्य को
देता हुआ अर्घ्‍य
शताब्दियों से इसी तरह
गंगा के जल में
अपनी एक टाँग पर खड़ा है यह शहर
अपनी दूसरी टाँग से
बिलकुल बेखबर!