
पंडित केदार नाथ व्यास
वाराणसी. पडित केदारनाथ व्यास, उम्र 87 वर्ष। वो व्यास जी जो कभी श्री काशी विश्वनाथ मंदिर , ज्ञानवापी परिसर के स्वामी हुआ करते थे। अब किराए के मकान में रह रहे हैं। व्यास जी का पुराना भवन जो काशी की धरोहर था उसे मंदिर प्रशासन जमींदोज कर चुका है। वह भी जबरन। यह कहानी भी जुड़ी है श्री काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, गंगा पाथ वे की पीएम के ड्रीम प्रोजेक्ट से। व्यास जी को मंदिर प्रशासन ने मंदिर परिक्षेत्र से बाहर जरूर कर दिया है लेकिन उन्होंने अभी भी हिम्मत नहीं हारी है। फिलहा वो राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से गुहार लगा रहे हैं। उनका सवाल है कि विश्वनाथ मंदिर परिक्षेत्र के सौंदर्यीकरण और गंगा पाथवे के लिए हमारा ऐतिहासिक घर प्रशासन ने क्यों ध्वस्त कर दिया ? अब राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री हमारा घर बनवाकर मुझे दें। इसके लिए उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया है। वैसे फिलहाल उनके सवालों का जवाब नहीं मिल रहा। जिस भवन को मंदिर प्रशासन ने ध्वस्त किया है उसी घर में व्यास जी का "काशी शोध अनुसंधान संस्थान" था जो अब मलवे में तब्दील हो गया है।
व्यास जी कोई साधारण इंसान नहीं, एक से बढ़ कर एक किताबों की रचना की। उस रचनाधर्मिता को जीवंतता प्रदान करने के लिए वर्षों दूसरी किताबों में खुद को खपाया। व्यास जी की चर्चित पुस्तक है "पंचकोशात्मक ज्योतिर्लिंग काशीमाहात्म्य" और "अन्नपूर्णा कथा"। उन्हे अपने घर से जितना मोह है, उतना ही किताबों से भी। घर गिरने से अनेक पुस्तकें नष्ट हो गईं हैं, जो शेष हैं उसे एक गठरी में बांधकर अपने विस्तर के पास ही सहेज कर रखा है। इसमें अनेक संस्कृत व हिन्दी की दुर्लभ पुस्तकें शामिल हैं। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जब मंदिर तोड़ने के विरोध में पक्कामहाल की गलियों में पदयात्रा कर रहे थे तो व्यास जी से मिलने उनके घर गए थे। व्यास जी की व्यथा सुनकर स्वामी जी की आंखों से अश्रुधारा बह निकली थी। वह चाह कर भी खुद को रोक न सके थे।
व्यास जी के घर में ही आदि शंकराचार्य से शास्त्रार्थ करने वाले मंडन मिश्र की मूर्ति भी थी, जिसकी वो नियमित पूजा करते थे। घर के परिसर में 40 देवी-देवताओं की प्रतिमाएं थीं, जो अब मलवे में समाहित हो गई हैं। पढ़ना-लिखना और पूजा-पाठ करना ही उनकी दिनचर्या थी। अपने घर में ही वह प्रतिदिन भोर में उठकर सभी देवी-देवताओं की पूजा करते थे। व्यास जी के अनुसार मेरा घर "धरोहर" था, फिर "विकास" के लिए उसे क्यों गिरा दिए ? यही सवाल वह देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से भी पूछ रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जब पक्कामहाल में रहकर पढाई करते थे तब की अनेक स्मृतियां उनकी जेहन में हैं। यह वह घर था जिसमें आजादी की पटकथा लिखी गई। आजादी से पहले एक बार महात्मा गांधी भी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन करने आए थे. मोतीलाल नेहरू, पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से तो मंदिर परिसर में उनकी कई बार आए और व्यास जी से मुलाकात की, तब इंदिरा गांधी बहुत छोटी थीं और अपने पिता के साथ आती थीं। वरिष्ठ पत्रकार सुरेश प्रताप से बातचीत में व्यास जी ने कहा, मेरे घर जर्मनी, इंग्लैंड, फ्रांस आदि देशों के अनेक विद्वान विमर्श करने आते थे।
अब देश के शीर्ष सत्तानशीं लोगों से व्यास जी का कहना है कि 50 लाख से अधिक का सामान मेरा नष्ट हो गया है, जिसमें अधिकांश दुर्लभ पुस्तकें हैं। अब किराए की मकान में पक्कामहाल में ही अपने परिवार के साथ रहते हैं। तीन कमरे हैं और किराया आठ हजार रूपये महीना। प्रतिमाह लगभग एक हजार रूपये बिजली की बिल अलग। उन्हें चिंता है कि इतने रूपये कहां से आएंगे। अब तो स्वास्थ्य भी साथ नहीं दे रहा है। न कान से सुनाई देता है, न आंखें ही साथ दे रहीं। ऐसे में आत्मबली 87 वर्ष का यह बुजुर्ग व्यास अब भी बुलंद आवाज में पूछ रहा है कि हमारे घर, मंदिर और पुस्तकों को मलवे में तब्दील करके तुम किसका और कैसा "विकास" करना चाहते हो ?
Published on:
04 May 2018 02:21 pm
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