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BHU की प्रोफेसर से जानिए देवउठनी एकादशी पर क्यों मनाते हैं तुलसी विवाह की परंपरा…

-तुलसी में ही है सबसे ज्यादा रोग प्रतिरोधक क्षमता-आध्यात्मिक गुणों से है भरपूर-तुलसी का पौधा लगाने से पर्यावरण रहता है सुरक्षित-घर में नहीं आती विपत्ति, मिलती है धन-धान्य से परिपूर्णता

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तुलसी

तुलसी

डॉ अजय कृष्ण चतुर्वेदी

वाराणसी. तुलसी (ऑसीमम सैक्टम) एक द्विबीजपत्री तथा शाकीय, औषधीय पौधा है जो 1 से 3 फुट ऊंचा होता है। इसे वृंदा, वृंदावनी, विश्वपूजिता, विश्वपावनी, पुष्पसारा, नन्दिनी, तुलसी तथा कृष्ण जीवनी आदि नमो से भी जाना जाता है। इसकी पत्तियां बैंगनी आभा वाली हल्के रोएं से ढकी होती हैं। पत्तियां 1 से 2 इंच लम्बी सुगंधित और अंडाकार या आयताकार होती हैं। पुष्प मंजरी अति कोमल एवं 8 इंच लम्बी और बहुरंगी छटाओं वाली होती है, जिस पर बैंगनी और गुलाबी आभा वाले बहुत छोटे हृदयाकार पुष्प चक्रों में लगते हैं। बीज चपटे पीतवर्ण के छोटे काले चिह्नों से युक्त अंडाकार होते हैं। नए पौधे मुख्य रूप से वर्षा ऋतु में उगते है और शीतकाल में फूलते हैं। पौधा सामान्य रूप से दो-तीन वर्षों तक हरा बना रहता है। इसके बाद इसकी वृद्धावस्था आ जाती है। पत्ते कम और छोटे हो जाते हैं और शाखाएं सूखी दिखाई देती हैं। इस समय उसे हटाकर नया पौधा लगाने की आवश्यकता प्रतीत होती है। बता दें कि इस बार 8 नवंबर को है देवउठनी एकादशी जिस दिन मनाया जाएगा तुलसी व विष्णु का विवाह।

तुलसी के प्रकार व गुण

बीएचयू के वनस्पति विज्ञान विभाग की प्रो शशि पांडेय ने बताया कि इनमें ऑसीमम सैक्टम को प्रधान या पवित्र तुलसी माना गया जाता है, इसकी भी दो प्रधान प्रजातियां हैं, श्री तुलसी जिसकी पत्तियां हरी होती हैं तथा कृष्णा तुलसी जिसकी पत्तियां निलाभ-कुछ बैंगनी रंग लिए होती हैं। श्री तुलसी के पत्र तथा शाखाएं श्वेताभ होते हैं जबकि कृष्ण तुलसी के पत्रादि कृष्ण रंग के होते हैं। गुण, धर्म की दृष्टि से काली तुलसी को ही श्रेष्ठ माना गया है, लेकिन अधिकांश विद्वानों का मत है कि दोनों ही गुणों में समान हैं। तुलसी का पौधा हिंदू धर्म में पवित्र माना जाता है और लोग इसे अपने घर के आंगन या दरवाजे पर या बाग में लगाते हैं। भारतीय संस्कृति के चिर पुरातन ग्रंथ वेदों में भी तुलसी के गुणों एवं उसकी उपयोगिता का वर्णन मिलता है। इसके अतिरिक्त ऐलोपैथी, होमियोपैथी और यूनानी दवाओं में भी तुलसी का किसी न किसी रूप में प्रयोग किया जाता है।

तुलसी की उत्पत्ति

जब देवताओं और दानवों के बीच में समुद्र मंथन हुआ था तो उस वक़्त मंथन में से अमृत निकला था जिसके छलकने की वजह से उसके कुछ कण भूमि पर गिर गए थे और इसी से तुलसी की उत्पत्त्ति हुई थी। उस वक़्त ब्रहम देव जी ने तुलसी को भगवान विष्णु जी को सौंप दिया था, तभी से तुलसी जी भगवान श्री विष्णु जी को बहुत प्रिय है और माना जाता है कि भगवान विष्णु जी की पूजा में अगर तुलसी के पत्ते ना रखें जाएं तो उनकी पूजा पूर्ण नही होती। अमृत से उत्पन्न होने के कारण ही तुलसी को पापनाशक और मोक्षदायक माना जाता है और देवपूजा और श्राद्धकर्म, हवं, यज्ञ, व्रत, जप इत्यादि में इसका बहुत महत्व है।

वही दूसरे मत के अनुसार तुलसी की उत्पत्ति के संबंध में ब्रह्मवैवर्त पुराण में यह कथा है की तुलसी नाम की एक गोपिका गोलोक में राधा की सखी थी। एक दिन राधा ने उसे कृष्ण के साथ विहार करते देख शाप दिया कि तू मनुष्य शरीर धारण कर। शाप के अनुसार तुलसी धर्मध्वज राजा की कन्या हुईं। उसके रूप की तुलना किसी से नही हो सकती थी, इससे उसका नाम 'तुलसी' पड़ा। तुलसी ने बन में जाकर घोर तप किया और ब्रह्मा से इस प्रकार वर मांगा की 'मैं कृष्ण की रति से कभी तृप्त नहीं हुई हूं। मैं उन्हीं को पति रूप में पाना चाहती हूं। ब्रह्मा के कथानानुसार तुलसी ने शंखचूड़ नामक राक्षस से विवाह किया।शंखचूड़ को वर मिला था कि बिना उसकी स्त्री का सतीत्व भंग हुए उसकी मृत्यु न होगी। ऐसे में जब शंखचूड़ ने संपूर्ण देवताओं को परास्त कर दिया, तब सब लोग विष्णु के पास गए। विष्णु ने शंखचूड़ का रूप धारण करके तुलसी का सतीत्व नष्ट किया। इसपर तुलसी ने नारायण को शाप दिया कि 'तुम पत्थर हो जाओं', जब तुलसी नारायण के पैर पर गिरकर बहुत रोने लगी, तब विष्णु ने कहा, 'तुम यह शरीर छोड़कर लक्ष्मी के समान मेरी प्रिया होगी। तुम्हारे शरीर से गंडकी नदी और केश से तुलसी वृक्ष होगा। ' तब से बराबर शालिग्राम ठाकुर की पूजा होने लगी और तुलसी दल उनके मस्तक पर चढ़ने लगा। वैष्णव तुलसी की लकडी़ की माला और कंठी धारण करते हैं। बहुत से लोग तुलसी शालिग्राम का विवाह बड़ी धूमधाम से एकादशी के दिन करते हैं। कार्तिक मास में तुलसी की पूजा घर घर होती है, क्योकि कार्तिक की अमावस्या तुलसी के उत्पन्न होने की तिथि मानी जाती है।

पौराणिक महत्व से अलग तुलसी एक जानी-मानी औषधि भी है

इसमें कई रोगों का निवारण करने की क्षमता होती है। इसको भारत वर्ष में पूजा भी जाता है और अत्यंत पवित्र माना जाता है। प्राचीन समय से ही तुलसी के पौधों का धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व के साथ ही औषधीय गुण जन-जन के बीच विख्यात है। ऐसा माना जाता है कि घर में तुलसी का पौधा लगाने से घर में सकारात्मकता, धन-दौलत, ज्ञान, ऐश्‍वर्य, शांति, आरोग्य एवं शुद्धता का वास बना रहता है। यही वजह है कि तुलसी को अत्यधिक गुणकारी एवं अद्वितीय भी माना जाता है। अभ्दिद् शास्त्रवैत्ता तुलसी को पुदीने की जाति में गिनते हैं।

तुलसी के प्रकार

तुलसी अनेक प्रकार की होती है। गरम देशों में यह बहुत अधिक पाई जाती है। अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका में इसके अनेक प्रकार मिलते हैं। अमेरिका में एक प्रकार की तुलसी होती है जिसै ज्वर जड़ी कहते हैं। भारत वर्ष में भी तुलसी कई प्रकार की पाई जाती है; जैसे, गंभ तुलसी, श्वेत तुलसी या रामा, कृष्ण तुलसी या कृष्णा, वर्वरी तुलसी या ममरी। तुलसी की पत्ती मिर्च आदि के साथ ज्वर में दी जाती है। बैद्यक में यह गरम, कडुई, दाहकारक, दीपन तथा कफ, वात और कुष्ट आदि को दूर करनेवाली मानी जाती है। तुलसी को वैष्णव अत्यंत पवित्र मानते हैं। शालिग्राम ठाकुर की पूजा बिना तुलसीपत्र के नहीं होती। चरणामृत आदि में भी तुलसीदल डाला जाता है। यह पाया गया है कि तुलसी के पौधे के नज़दीक जाने से ही हम काफी संक्रमणों से बच सकते हैं।

तुलसी पत्ते के फायदे

तुलसी के पत्ते खाने के फायदे भी ढेरों हैं। यदि तुलसी की कुछ पत्तियां पानी में डाल दी जाये तो पानी एकदम शुद्ध और स्वच्छ हो जाता है। खांसी, जुखाम आदि जैसे संक्रामक रोगों का बहुत ही आसान और फायदेमंद इलाज तुलसी के सेवन से हो जाता है इसकी रोग निरोधक क्षमता और भारत वर्ष में म्हत्त्वता के कारण तुलसी को उच्च स्थान प्रदान किया गया है। ताजा और पवित्र तुलसी के पत्तों के एक-चौथाई कप (छः ग्राम) में निम्नलिखित शामिल हैं: 1 कैलोरी, कोलेस्ट्रॉल नहीं होता है , 0.2 ग्राम सोडियम, 0.2 ग्राम कार्बोहाइड्रेट, 25 माइक्रोग्राम विटामिन के , 317 आईयू विटामिन ए, 0.1 मिलीग्राम मैंगनीज।

तुलसी में पाए जाते हैं अनेक सक्रिय जैव रसायन

प्रोफेसर शशि पांडेय ने बताया की तुलसी में अनेक जैव सक्रिय रसायन पाए जाते हैं, जिनमें ट्रैनिन, सैवोनिन, ग्लाइकोसाइड और एल्केलाइड्स प्रमुख हैं। अभी भी पूरी तरह से इनका विश्लेषण नहीं हो पाया है। प्रमुख सक्रिय तत्व हैं एक प्रकार का पीला उड़नशील तेल जिसकी मात्रा संगठन स्थान व समय के अनुसार बदलते रहते हैं। 0.1 से 0.3 प्रतिशत तक तेल पाया जाना सामान्य बात है। 'वैल्थ ऑफ इण्डिया' के अनुसार इस तेल में लगभग 71 प्रतिशत यूजीनॉल, बीस प्रतिशत यूजीनॉल मिथाइल ईथर तथा तीन प्रतिशत कार्वाकोल होता है। श्री तुलसी में श्यामा की अपेक्षा कुछ अधिक तेल होता है तथा इस तेल का सापेक्षिक घनत्व भी कुछ अधिक होता है। तेल के अतिरिक्त पत्रों में लगभग 83 मिलीग्राम प्रतिशत विटामिन सी एवं 2.5 मिलीग्राम प्रतिशत कैरीटीन होता है। तुलसी बीजों में हरे पीले रंग का तेल लगभग 17.8 प्रतिशत की मात्रा में पाया जाता है। इसके घटक हैं कुछ सीटोस्टेरॉल, अनेकों वसा अम्ल मुख्यतः पामिटिक, स्टीयरिक, ओलिक, लिनोलक और लिनोलिक अम्ल। तेल के अलावा बीजों में श्लेष्मक प्रचुर मात्रा में होता है। इस म्युसिलेज के प्रमुख घटक हैं-पेन्टोस, हेक्जा यूरोनिक अम्ल और राख। राख लगभग 0.2 प्रतिशत होती है।

प्रोफ़ेसोर पांडेय ने यह भी बताया की आयुर्वेद के अनुसार तुलसी के पांचों प्रकारों श्याम तुलसी , राम तुलसी, श्वेत/विष्णु तुलसी, वन तुलसी, नींबू तुलसी को मिलाकर इनका अर्क निकाला जाए, तो यह एक प्रभावकारी और बेहतरीन दवा बन सकती है। यह एक एंटी-ऑक्सीडेंट, एंटी- बैक्टीरियल, एंटी-वायरल, एंटी-फ्लू, एंटी-बायोटिक, एंटी-इफ्लेमेन्ट्री व एंटी डिजीज की तह कार्य करने लगती है। जानिए इस अनमोल दवा के यह बेशकीमती फायदे -.पांच तुलसी का यह अर्क सैकड़ों रोगों में लाभदायक सिद्ध होता है। बुखार, फ्लू, स्वाइन फ्लू, डेंगू, सर्दी, खांसी, जुखाम, प्लेग, मलेरिया, जोड़ों का दर्द, मोटापा, ब्लड प्रेशर, शुगर, एलर्जी, पेट में कृमि, हेपेटाइटिस, जलन, मूत्र संबंधी रोग, गठिया, दम, मरोड़, बवासीर, अतिसार, आंख दर्द , खुजली, सिर दर्द, पायरिया, नकसीर, फेफड़ों की सूजन, अल्सर, वीर्य की कमी, हार्ट ब्लॉकेज आदि समस्याओं से एक साथ निजात दिलाने में सक्षम है।. यह मिश्रण एक बेहतरीन विष नाशक की तरह कार्य करती है। इसके रोजाना सेवन से शरीर से हानिकारक एवं अवांछित तत्व बाहर निकल जाते हैं और शरीर के आंतरिक अंगों की भी सफाई होती है। श्री तुलसी स्मरण शक्ति को बढ़ाने के लिए बेहद कारगर उपाय हैं।. इसके सेवन से लाल रक्त कणों में इजाफा होता है और हीमोग्लोबिन का स्तर बढ़ता है। एक बूंद श्री तुलसी का प्रतिदिन सेवन करने से पेट संबंधी बीमारियां धीरे-धीरे समाप्त हो जाती हैं। वहीं गर्भवती महिलाओं में उल्टी की परेशानी होने पर भी यह लाभकारी है।. शरीर की त्वचा जल जाने पर इसका रस लगाना लाभदायक है वहीं किसी विषैले जीव-जंतु के काटने पर इसे लगाने राहत मिलती है और जहर भी उतरता है। इसकी कुछ बूंदें शरीर पर लगाकर सोने से मच्छरों से बचा जा सकता है। त्वचा की हर समस्या का समाधान है इसके पास। नींबू के रस के साथ इसे त्वचा पर लगाने से त्वचा की सफाई होगी और चेहरा दमकने लगेगा। सुबह और शम के वक्त चेहरे पर इसका इस्तेमाल करने पर कील, मुंहासे, दाग-धब्बे और झाइयों से निजात मिलेगी। इसे नारियल तेल के साथ लगाने से सफेद दाग भी ठीक हो जाता है।