
काशी के जंगमबाड़ी स्थित श्री काशी पीठ में स्थापित शिवलिंग
वाराणसी. लघु भारत के रूप में विख्यात धर्म नगरी काशी में वीरशैव संप्रदाय के लोग भी रहते हैं। जंगमबाड़ी क्षेत्र में इनका एक मठ भी है। वीरशैव संप्रदाय ईष्टलिंग के पूजन का विशेष महत्व है। ऐसे में संप्रदाय के लोग इस मठ में शिवलिंग की स्थापना तो करते ही हैं, साथ ही उनके गले में भी शिवलिंग (ईष्टलिंग) धारण करते हैं। इतना ही नहीं वो इस ईष्टलिंग का नियमित तौर पर रोजाना अभिषेक भी करते हैं।
गर्भवती माता गर्भ धारण करने के आठवें माह में धारण करती है ईष्टलिंग
मान्यता है कि गर्भवती माता गर्भ धारण करने के बाद आठवें माह में ईष्टलिंग धारण करती हैं। बच्चे जन्म के पांचवें दिन नवजात को ईष्टलिंग धारण कराया जाता है। हालांकि आठ साल तक बच्चे का ईष्टलिंग माता ही अपने पास रखती हैं और नित्य प्रति उसकी पूजा करती हैं। आठ वर्ष का होने के बाद बच्चे को दीक्षा दी जाती है। उसके पश्चात ईष्टलिंग बच्चा खुद अपने गले में धारण करने लगता है।
वीरशैव संप्रदाय के लोगों के निधन पर दी जाती है भू- समाधि
वीरशैलव संप्रदाय के लोगों के निधन पर उन्हें भू-समाधि दी जाती है। भू-समाधि देते वक्त मृत व्यक्ति के गले में धारण किए गए ईष्टलिंग को हटाया नहीं जाता बल्कि ईष्टलिंग के साथ ही समाधि दी जाती है। यह प्रक्रिया सबके लिए है। इसके तहत शव को थैले में रख कर भू-समाधि दी जाती है।
संप्रदाय के लोगों का पिंडदान भी नहीं होता
इस संप्रदाय के लोगों का पिंडदान नहीं होता। माना जाता है कि मृत्यु के पश्चात आत्मा लिंगरूप में मुक्त हो गई। ऐसे में अब पुनर्जन्म नहीं होगा बल्कि मोक्ष की प्राप्ति हो गई।
मठ में हैं हजारों छोटे-बड़े शिवलिंग
जंगमबाड़ी मठ में हजारों शिवलिंग हैं। आम बोलचाल की भाषा में कहा जाता है कि मठ में शिवलिंग की खेती होती है। लेकिन हकीकत ये है कि संप्रदाय से जुड़े लोग यहां अपने पूर्वजों की स्मृति में शिवलिंग की स्थापना करते है। यही वजह है कि मठ में देश के विभिन्न प्रांतों और यहां तक कि विदेशों में बसे लोग भी आ कर शिवलिंग स्थापित करते हैं। ये जानकारी जंगमबाड़ी स्थित श्री काशी मठ में चल रहे महासम्मेलन बताई गईं।
Published on:
15 May 2022 09:51 am
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