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संस्कृत विश्वविद्यालय में भूमि घोटालाः प्रशासनिक अधिकारियों-कर्मचारियों की मिली भगत से दान की जमीन अपने नाम कराया, शासन ने तलब की रिपोर्ट

संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में बड़े भूमि घोटाले का मामला प्रकाश में आया है। कुलपति की शिकायत पर शासन ने इसे गंभीरता से लिया और विश्वविद्यालय प्रशासन से पूरी रिपोर्ट तलब की है। इस मामले में अपर मुख्य सचिव ने कुलपति प्रो हरेराम त्रिपाठी से बात भी की है। अब विश्वविद्यालय सारे उपलब्ध रिकार्ड एकत्र करने में जुटा है।

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संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय (फाइल फोटो)

संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय (फाइल फोटो)

वाराणसी. संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में बड़ा भूमि घोटाला प्रकाश में आया है। कुलपति प्रो हरेराम त्रिपाठी ने इस संबंध में शासन से शिकायत की तो अपर मुख्य सचिव ने कुलपति से वार्ता कर पूरी रिपोर्ट तलब की है। घटना के संबंध में बताया जा रहा है कि 67 साल पहले दान में मिली जमीन पर दानदाता के बेटे ने ही प्रशासनिक अधिकारियों व कर्मचारियों की मिली भगत से जमीन फिर से अपने नाम करा ली है।

सारे साक्ष्य एकत्र कर दर्ज होगा मुकदमा

मिली जानकारी के अनुसार 1955 में राजा यादवेंद्र दत्त दुबे ने संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय को 2.5010 हेक्टेयर जमीन बेची और 0.2710 हेक्टेयर जमीन को दान दी थी। इन दोनों ही जमीनों पर राजा के यादवेंद्र दत्त के बेटे अवनींद्र दत्त दुबे ने अपना नाम चढ़वा लिया है। इसका खुलासा जमीन पर विश्वविद्यालय का नाम दर्ज कराने के लिए गठित कमेटी की जांच में हुआ। इसके बाद विश्वविद्यालय के संपत्ति विभाग में दान और क्रय से संबंधित फाइलों के मार्फत हर जानकारी जुटाई जा रही है। इस संबंध में कुलपति प्रो. हरेराम त्रिपाठी का कहना है कि जांच कमेटी विधि विशेषज्ञों के संपर्क में है। इस मामले में सारे साक्ष्य जुटा कर जल्द ही मुकदमा दर्ज कराया जाएगा।

भूमि घोटाला पर अपर मुख्य सचिव ने तलब की रिपोर्ट

इस मामले में बुधवार को अपर मुख्य सचिव ने संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति से टेलीफोनिक वार्ता कर मामले की पूरी जानकारी हासिल की। बातचीत के दौरान उन्होंने भूमि घोटाले से संबंधित पूरी रिपोर्ट तलब की। इस पर कुलपति का कहना है कि रिपोर्ट तैयार हो रही है। जल्द ही इसे शासन को भेज दिया जाएगा।

आयुर्वेदिक कॉलेज भवन वापस लिया जाएगा

बता दें कि संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय परिसर में आयुर्वेद कॉलेज भवन है। इस कॉलेज की स्थापना 1965 में देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद के वैद्य पं. सत्यनारायण शास्त्री की देखरेख में थी। 1982 तक यह आयुर्वेद कॉलेज संस्कृत विश्वविद्यालय का ही अंग रहा। लेकिन कालांतर में प्रदेश सरकार ने इसका अधिग्रहण कर लिया और यह राजकीय आयुर्वेद कॉलेज हो गया। फिर कॉलेज को 2014 में चौकाघाट स्थित नए भवन में स्थानांतरित कर दिया गया। लेकिन विश्वविद्यालय परिसर स्थित आयुर्वेद कॉलेज का भवन विश्वविद्यालय को नहीं लौटाया गया। अब विश्वविद्यालय प्रशासन परिसर स्थित आयुर्वेद कॉलेज भवन को वापस लेने की तैयारी में जुट गया है। आयुष विभाग के अधीन इस भवन को संस्कृत विश्वविद्यालय को वापस देने के लिए उच्च शिक्षा विभाग की अपर मुख्य सचिव ने पत्र लिखा है।