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महादेव की नगरी काशी में कन्हैया ने किया कालिया नाग का अंत, गंगा बनी जमुना

धर्म की नगरी काशी में शुक्रवार को गंगा में यमुना नदी का नजारा देखने को मिला। काशी का गंगा तट वृन्दावन बना और बाल गोपाल नन्द गोपाल कृष्ण मुरारी ने गेंद लेने के लिए गंगा रुपी यमुना में छलांग लगाईं और कुछ ही पल में कालिया नाग के मस्तक पर बंसी बजाते हुए प्रकट हुए तो पूरा गंगा घाट बोलो कन्हैया लाल की जय के जयकारे से गूंज उठा।

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 Kanha emerged from Ganga in the form of Yamuna playing flute on the hood of Kaliya

कालिया के फन पर बांसुरी बजाते यमुना रुपी गंगा से निकले कान्हा

वाराणसी। कालिया नाग के जहर से जमुना का पानी अत्यंत विषैला हो चुका था। ऐसे में अपने बाल मित्रों संग जमुना किनारे गेंद खेल रहे कन्हैया की गेंद जमुना में गई तो सभी ने मना किया कि वहां नहीं जाना पर कन्हैया नहीं माने और जमुना जी में छलांग लगा दी। काशी में तुलसीघाट पर पिछले 497 सालों से मंचित की जा रही नाग नथैया लीला को देखने के लिए लाखों लोग उपस्थित रहे। इस दौरान काशी नरेश महाराजा कुणावर अनंत नरायन सिंह भी रामनगर दुर्ग से बजड़े पर सवार होकर लीला स्थल पर पहुंचे और लीला देखी। वहीं कालिया नाग के मस्तक पर बांसुरी बजाते भगवान् कृष्ण निकले तो सभी ने हर हर महादेव का जयघोष किया।

अखाड़ा गोस्वामी तुलसीदास करता है आयोजन

गोस्वामी तुलिसदास के जमाने से चली आ रही कान्हा की नाग नथैया की लीला इस वर्ष भी अपनी परंपरा के अनुरूप संपन्न कराई गई। 22 दिन चली इस लीला के अंतिम दिन गंगा बानी यमुना के तट पर बांके बिहारी कान्हा अपने मित्रों संग गेंद खेल रहे हैं, जैसे ही गेंद यमुना में जाती है। वैसे ही कान्हा कदंब के वृक्ष पर चढ़ जाते हैं और यमुना में छलांग लगा देते हैं। इधर पूरा वृन्दावन बेचैन हो उठता है क्योंकि यमुना का पानी कालिया नाग ने विषैला कर दिया था पर कुछ ही देर बाद अखाड़ा गोस्वामी तुलसीदास द्वारा कराई जाने वाली इस लीला में कान्हा बांसुरी बजाते हुए कालिया के फन पर प्रकट हुए तो जयकारा लगने लगा।


स्थानीय होते हैं कलाकार

इस संबंध में नाग नथैया आयोजक और संकटमोचन मंदिर के महंत प्रोफेसर विश्वंभरनाथ मिश्रा ने बताया कि यह काशी का लक्खा मेला में शुमार मेला है जिसे गोस्वामी तुलसीदास ने शुरू किया था और आज तक अनवरत ये लीला हो रही है। इस लीला में अस्सी और भदैनी क्षेत्र के ही कलाकार होते हैं। कोई भी कलाकार बाहरी नहीं होते हैं। इस लक्खा मेला में लाखों श्रद्धालुओं ने लीला देखी।

क्या है लक्खा मेला

बता दें कि काशी के चार लक्खा मेला प्रसिद्ध हैं। इसमें रथयात्रा का मेला, नाटी इमली का भरत मिलाप, चेतगंज की नक्कटैया और तुलसी घाट की नाग नथैया शामिल है। इन मेलों में एक लाख से अधिक की भीड़ आती है। ऐसे में इन्हे लक्खा मेला कहा जाता है।