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BIRTHDAY SPECIAL: महामना ने चंदा मांगकर की थी बीएचयू की स्थापना, नीलाम कर दी थी निजाम की जूती

हिंदी भाषा को प्रतिष्ठित करने में भी उनकी बड़ी भूमिका रही

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Madan mohan malaviya

मदन मोहन मालवीय

वाराणसी. भारत रत्न से सम्मानित और देश को बीएचयू जैसा विश्वविद्यालय देने वाले महामना मदन मोहन मालवीय का आज जन्मदिन है । इलाहाबाद में 25 दिसंबर 1861 को जन्मे मालवीय जी ने पांच साल की उम्र से ही संस्कृत की पढ़ाई शुरू कर दी थी। उनके पिता संस्कृत भाषा के प्रकांड विद्वान थे और श्रीमद्भागवत की कथा सुना कर आजीविका चलाते थे। धर्म ज्ञानोपदेश पाठशाला से उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी की। फिर उन्होंने इलाहाबाद जिला स्कूल में दाखिला लिया। 1879 में उन्होंने दसवीं की परीक्षा पास की। फिर कोलकाता यूनिवर्सिटी से बीए किया। बीए पास करने के बाद वे शिक्षक बन गए। बाद में उन्होंने एलएलबी किया और इलाहाबाद हाई कोर्ट में अधिवक्ता बने। पूरे भारत में वो अकेले ऐसे शख्स हैं जिन्हें उनके महान कार्यों के लिए 'महामना' की उपाधि दी गई ।

चंदा जुटाकर की थी बीएचयू की स्थापना
देश के अग्रणी संस्थानों में एक बीएचयू की स्थापना करने वाले मालवीय जी को इसे बनाने के लिये कड़ी मेहनत करनी पड़ी । उन्होंने विश्वविद्यालय के लिए चंदा भी मांगा था । मालवीयजी चंदा मांगने हैदराबाद के निजाम के पास पहुंचे। निजाम ने चंदा देने से इनकार किया। जब मालवीयजी अड़े रहे तो निजाम ने कहा कि मेरे पास दान के लिए केवल अपनी जूती है। उदार मालवीयजी इसीे लेने के लिए राजी हो गए। निजाम की जूती ली और उसकी हैदराबाद के चारमीनार के पास नीलामी लगा दी। निजाम की मां चारमीनार के पास से बग्घी में गुजर रही थीं। जबरदस्त भीड़ देखी तो पता करवाया तो पता चला कि निजाम की जूती 4 लाख रुपए में नीलाम हो रही है। निजाम की मां को लगा कि बेटी की इज्जत नहीं बची तभी तो जूती की नीलामी लग रही है। उन्होंने निजाम को खबर भिजवाई। निजाम ने मालवीयजी को बुलवाया और बड़ा दान दिया । इससे जुड़ा एक और किस्सा है, बीएचयू के लिए जमीन दान मांगने महामना मदन मोहन मालवीय काशी के महाराज के पास गए थे। महाराज ने कहा कि शाम होने तक जितनी जमीन पैदल चलकर नाप सकते हैं, वह सब बीचएयू के लिए होगी। इसके बाद मालवीयजी ने ऐसा ही किया और आज यह एशिया की सबसे बड़ी यूनिवर्सिटी है। चार फरवरी 1916 को काशी हिंदू विश्वविद्यालय की नींव रखी गई ।

हिंदी भाषा को प्रतिष्ठित करने में भी उनकी बड़ी भूमिका रही। देश में पहली बार हिंदी भाषा को एक विषय के रूप में इसी विश्वविद्यालय में पढ़ाना शुरू किया गया। वे 1919-1938 तक बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति रहे। विश्वविद्यालय की स्थापना से जुड़ा एक रोचक वाकया भी है । कहा जाता है कि सर सुंदर लाल जी महामना मदन मोहन मालवीय जी की चुटकी लेते थे कि और आप के हिन्दू विश्व विद्यालय का क्या हुआ? उन्ही महामना ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के मूर्त रूप लेने पर सर सुंदर लाल जी को प्रथम कुलपति बनाया एवं हॉस्पिटल का नाम सर सुंदर लाल हॉस्पिटल रखा ।

हिंदू-मुस्लिम एकता के समर्थक थे मालवीय
मालवीय जी ने हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए काफी काम किए। उन्होंने सांप्रदायिक सौहार्द पर दो प्रसिद्ध भाषण दिए जिनमें से एक भाषण उन्होंने 1922 में लाहौर में दिया था और दूसरा 1931 में कानपुर में। दोनों भाषण की खूब चर्चा हुई थी ।