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मदन मोहन मालवीय जयंती विशेष: अद्वितीय है महामना की संकल्पना

महामना का मानना था कि बच्चे जिस भाषा में संवाद करते हैं उन्हें उसी भाषा में शिक्षा मिलनी चाहिए।

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लेख लिखने वाले डॉक्टर शैव्य कुमार पाण्डेय (दायें)

'मधुर मनोहर अतीव सुंदर यह सर्वशिक्षा की राजधानी', काशी हिंदू विश्वविद्यालय का यह कुलगीत वास्तव में काशी की ज्ञान परंपरा की सूक्ष्मता से परिभाषित करता है। विश्व के सबसे बड़े आवासीय विश्वविद्यालय की संकल्पना पंडित मदन मोहन मालवीय ने सोची और उसे 4 फरवरी 1916 में मूर्त रूप दिया।

महामना का जन्म 25 दिसंबर 1861 में इलाहाबाद में हुआ। उनके पिता का नाम पंडित ब्रजनाथ एवं माता का नाम मूनादेवी था। उन्होंने विद्या के भव्य मंदिर के रूप में काशी हिंदू विश्वविद्यालय परिसर का निर्माण किया।

उनका मानना था कि विश्वविद्यालय के विशाल भवन के समान ही वहां पढ़ने वाले विद्यार्थियों के विचार भी विशाल होंगे। जो देश प्रेम के साथ भारत की विकास यात्रा को पूर्ण करेंगे।

विश्वविद्यालय में आयुर्वेद संकाय के ठीक सामने आधुनिक चिकित्सा विज्ञान संस्थान तथा प्रौद्योगिकी संस्थान के सामने कृषि विज्ञान संस्थान का निर्माण कराया गया है। जो परंपरा के साथ आधुनिक शिक्षा पद्धति के विचार के संतुलन को स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है। महामना का मानना था कि विद्यार्थियों के पास सभी तरह के ज्ञान को प्राप्त करने के समान अवसर होने चाहिए।

वह प्राचीन सभ्यता संस्कृति के साथ ही आधुनिक ज्ञान को भी अर्जित करें, इसके लिए उन्हें एक ही प्रांगण में सभी तरह की शिक्षा प्रदान किया जाना आवश्यक है। इसका उल्लेख काशी हिंदू विश्वविद्यालय की कुल गीत 'विविध कला, अर्थशास्त्री, गायन। गणित, खनिज, औषधि रसायन। प्रतीचि-प्राची का मेल सुंदर।' के रूप में किया गया है।

महामना विश्वविद्यालय में सरस्वती प्रतिमा स्थापना के पक्षधर नहीं थे। उनका मानना था कि विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले प्रत्येक छात्र देवोपम एवं छात्राएं सरस्वती का ही प्रतीक रूप बनेंगे। भिक्षा मांगकर काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना से महामना ने पूरी दुनिया को यह संदेश दिया कि किसी भी कार्य को पूर्ण करने के लिए दृढ़ इच्छा शक्ति होनी चाहिए।

महामना ने विश्वविद्यालय में ज्ञान के संचार को बेहतर बनाने के लिए विभिन्न महापुरुषों को जोड़ने का प्रयास भी किया। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन विश्वविद्यालय के कुलपति बने और उन्हें 9 वर्ष विश्वविद्यालय में अपनी सेवा दी।

सर सुन्दरलाल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, शांति स्वरूप भटनागर आदि ऐसे कई नाम हैं। जिन्होंने अपने ज्ञान से विश्वविद्यालय को सींचा है। दान से निर्मित विश्वविद्यालय को महामना समाज को समर्पित कर चले गए। उन्होंने ऐसा नियम बनाया कि विश्वविद्यालय पर उनका व उनके परिवार का कोई स्वामित्व अधिकार नहीं होगा।

महामना एक कर्म योगी थे जिन्होंने गीता के कर्म उपदेश को यथार्थ में प्रयोग किया। महामना द्वारा निर्मित काशी हिंदू विश्वविद्यालय ज्ञान का वह दीपक है जिससे आज पूरी दुनिया प्रकाशित हो रही है।

महामना का पर्यावरण प्रेम
महामना पंडित मदन मोहन मालवीय प्रकृति के बहुत ही प्रेमी थे। उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय में ज्यादातर स्थानों पर वृक्षारोपण किया। यह नियम भी बनाया कि एक वृक्ष के बूढ़े होने पर उसके आसपास तीन नए और पौधों का रोपण किया जाएगा। परिणाम स्वरूप आज काशी हिंदू विश्वविद्यालय में सड़क के किनारे एक तरफ सब जामुन के वृक्ष तो दूसरी तरफ सब आम के वृक्ष है।

कहीं सिर्फ कदम और नीम के वृक्ष दिखाई पड़ते हैं। यही नहीं महामना ने हिंदोस्तान अखबार में प्रत्येक गुरुवार को पर्यावरण विशेषांक निकालने की परंपरा को जन्म दिया। गंगा के जल को महामना प्राण-जल मानते थे। विदेश यात्रा के दौरान भी महामना अपने साथ गंगाजल लेकर जाते थे।

एक बार गांधी जी ने पूछा कि गंगाजल क्यों लाए हो उत्तर में महामना ने कहा, "यह पावन जल मेरे प्राणों के अणु-अणु में बसा है। इससे दूर तो कभी रह ही नहीं सकता किसी के लिए यह पानी हो सकता है किंतु मेरे लिए यह प्राण-जल है" महामना का यह पर्यावरण प्रेम वास्तव में आज भी प्रासंगिक है। प्रकृति के प्रति उनका समर्पण भाव उन्हें एक पर्यावरणविद के रूप में रेखांकित करता है।


नई शिक्षा नीति में महामना के विचार

महामना पंडित मदन मोहन मालवीय हिंदी भाषा के प्रबल समर्थक थे उनका मानना था कि बच्चे जिस भाषा में संवाद करते हैं उन्हें उसी भाषा में शिक्षाऔर न्याय प्रदान करनी चाहिए। महामना में एक भाषण में कहा कि "हमारे न्याय जिस भाषा में हमारे वकील द्वारा कराया जाता है उसे हम तनिक भी नहीं समझ पाते केवल कोर्ट में खड़े-खड़े ऑफिसर और वकीलों के मुंह की ओर ताका करते हैं या कितना बड़ा अन्याय है"

उन्होंने कोर्ट कचहरी में हिंदी भाषा में कामकाज शुरू करने हेतु काफी प्रयास किया। महामना के प्रयास के कारण ही जिला न्यायालय में आज हम अपनी राजभाषा में कार्यों का संपादन कर सकते हैं। महामना के इन

विचारों को नई शिक्षा नीति में भी शामिल किया गया है। नई शिक्षा नीति में मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा देने की संस्तुति प्रमुखता से की गई है।

(ये लेख स्कूल ऑफ मास कम्युनिकेशन जेईसीआरसी विश्वविद्यालय से डॉक्टर शैव्य कुमार पाण्डेय ने हमें भेजा है)