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गांधी की 150वीं जयंती पर विशेष- तब गांधी ने पूछा था, एक आदमी की जिंदगी के लिए पूरा शहर कैद क्यों?

ब्रिटिश गवर्नर की सुरक्षा को लेकर खड़े किए थे सवाल, देश के राजे रजवाड़ों को भी नहीं बख्शा। कहा, इनके आभूषणों से गरीब जनता के खून की दुर्गंध आ रही है।

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महात्मा गांधी और मदन मोहन मालवीय

महात्मा गांधी और मदन मोहन मालवीय

वाराणसी. महात्मा गांधी की पहली काशी यात्रा धार्मिक थी, तो दूसरी 1916 में बसंत पंचमी पर शैक्षणिक महत्व वाली। मौका था काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना का ऐतिहासिक त्रिदिवसीय स्थापनोत्सव। इस मौके पर वह महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी के आमंत्रण पर काशी आए थे।


मंच पर महामना मालवीय जी को एक वालंटियर ने चिट लाकर दी। उसे देखकर वह वीआईपी गेट की तरफ गए और लौटे तो साथ में एक व्यक्ति धोती-कुर्ता पहने, सफेद टोपी लगाए, लंबा डंडा लिए और एक झोला लटकाए चले आ रहे थे। सभा मंडप में खुसफुसाहट होने लगी कि मोहनदास करमचंद गांधी हैं। एक वर्ष पूर्व अफ्रीका से लौटे गांधी को लोग तब तक लोग देश में जानने लगे थे। गुरू गोपाल कृष्ण गोखले के सुझाव पर उन्होंने भारत भ्रमण शुरू किया था और प्रभाव स्वरूप गांधी का कायाकल्प होकर हिन्दुस्तान के आम जनजीवन के निकट स्थापित हो रहे गांधी के रूपान्तरण की प्रक्रिया ज़ारी थी। उनका कोट-पैंट, टाई वाला स्वरूप बदल चुका था।

महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के राजनीति विज्ञान विभाग के सेवानिवृत्त प्रोफेसर व स्व.पं.कमलापति त्रिपाठी के नजदी प्रो सतीश कुमार ने पत्रिका को बताया कि पंडित कमलापति जी उस घटना को बार-बार हम लोगो को सुनाते रहे। उसे सभा के बारे में उन्होने लिखा भी है। उसके अनुसार अनुसार सभा चल रही थी और सभा की अध्यक्षता महाराज दरभंगा कर रहे थे। सभा में देश भर से आए राजे-महाराजे, विशिष्टजन, गवर्नर आदि मौजूद थे। गवर्नर जनरल का आगमन विश्वविद्यालय के स्थापना समारोह के लिए ही हुआ था। चार साल पहले दिल्ली में गवर्नर जनरल को लक्ष्य कर जुलूस में बम फेंकने वाले क्रांतिकारी रास बिहारी बोस , बनारस षड्यंत्र केस एवं लाहौर षड्यंत्र केस में गिरफ्तारी से पूर्व साल भर पहले जापान निकल भागने से पूर्व रास बिहारी बोस बनारस में ही भूमिगत रहकर बंगाल एवं पंजाब के क्रांतिकारियों के बीच सेतु नायक की भूमिका निभाते थे। काशी में शचीन्द्र नाथ सान्याल सरीखे क्रांतिवीर शिष्य पैदा किए थे। ऐसे में बनारस, तत्कालीन जिला प्रशासन के लिए संवेदनशील शहर था और सुरक्षा के अभूतपूर्व प्रबंध थे।

इन सभी हालात में गांधी ने का ऐतिहासिक भाषण ,नगर में सुरक्षा एवं नागरिक जीवन प्राय: सील कर दिए जाने की तीखी आलोचना से ही शुरू हुआ। उन्होंने कहा कि यहां आते हुए देखा कि कैसे शहर कैदखाने में तब्दील कर दिया गया है। एक व्यक्ति की सुरक्षा के लिये पूरे शहर को कैदखाने में बदल देने की तीव्र आलोचना के साथ पूछा कि क्या एक व्यक्ति के मर जाने से ब्रिटिश शासन का अंत हो जाएगा ? उनके ऐसे तेवर वाले भाषण पर जहां सभी सकते में थे, वहीं एनी बेसेंट तिलमिला कर खड़ी हो गईं और बोलीं, मिस्टर गांधी, यू स्टाप इट, पर गांधी तो बोलते रहे और लगातार तालियां बजती ही रहीं।


उन्होंने हीरे जवाहरात जड़े परिधानों में बैठे राजा महाराजाओं को भी नहीं बख्शा। कहा कि इनके इन गहनों में मुझे भारत के गरीबों का रक्त दिखाई दे रहा है। इस पर तो सभी राजे महाराजे, एनी बेसेंट, गवर्नर आदि सभा से वाक आउट कर गए। इस खड़मंडल के बाद भी गांधी जी का भाषण जारी रहा और तालियां बजा रहा बड़ा जनसमुदाय डटा रहा। हालांकि अगले दिन मालवीय जी का उस भाषण के लिये खेद भी तब के मीडिया में आया। लेकिन मालवीय जी पूरे समय गांधी के भाषण में मंचासीन रहे और अध्यक्षता कर रहे दरभंगा नरेश भी बैठे रहे। संबोधन की काशी और देश में खूब चर्चा रही।