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गांधी की 150वीं जयंती पर विशेष- काशी के भारत माता मंदिर का उद्घाटन राष्ट्रपिता ने ही किया

भारत रत्न शिव प्रसाद गुप्त की थी परिकल्पना।

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भारत माता मंदिर और महात्मा गांधी

भारत माता मंदिर और महात्मा गांधी

वाराणसी. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी कुल 13 बार बनारस आए और उनकी हर काशी यात्रा का विशेष महत्व रहा। हर दफा वह कुछ न कुछ दे कर ही गए काशी को। देश ही नहीं दुनिया के नक्शे में काशी को विशेष दर्जा दिलाया। स्वतंत्रता आंदोलन में खास तरजीह दिलाई। दो-दो विश्वविद्यालयों के उद्घाटन के साक्षी रहे। यहां के युवाओं में नया जोश भरा। गवर्नर जनरल की मौजूदगी में उनकी सुरक्षा को लेकर ब्रिटिश हुकूमत को ललकारा तो राजे रजवाड़ों तक को नहीं बख्शा। यहां तक कि एनी बेसेंट ने जब उन्हें शांत कराने की कोशिश की तो उन्हें भी करार जवाब दिया।

इसी कड़ी में गांधी अपनी 11वीं यात्रा के दौरान जब काशी पहुंचे तो उन्होंने काशी विद्यापीठ परिसर में भारत माता मंदिर का उद्घाटन किया। वैसे इसकी परिकल्पना और स्थापना का श्रेय राष्ट्ररत्न शिव प्रसाद गुप्त को जाता है। लेकिन 25 अक्टूबर 1936 को बापू ने शिवप्रसाद जी की परिकल्पना को मूर्त आकार दिया। भारत माता मंदिर के उद्घाटन के साथ ही पौधरोपण भी किया। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ एवं गांधी दर्शन नामक पुस्तिका में इसका जिक्र है जिसमें यह बताया गया है कि उस उद्घाटन समारोह में करीब 25 हजार लोग मौजूद रहे।

इससे पहले गांधी जी जब काशी विद्यापीठ के दीक्षांत समारोह में भाग लेने के लिए 25 सितंबर 1929 को काशी आए। यही उनकी ही पहल थी कि ब्रिटिश हुकूमत में इस विश्वविद्यालय में परंपरागत गाउन और सिर पर हैट की जगह पीले रंग का खादी का गाउन और गांधी टोपी पहनने की परंपरा शुरू हुई जो अब भी कायम है। खुद गांधी जी ने भी यही परिधान धारण किया। इस मौके पर विद्यापीठ के छात्रों ने अपनी ओर से बापू को मानपत्र दिया। यह उनकी नौवीं यात्रा थी।

दसवीं बार वह 27 जुलाई 1934 को काशी आए। उस दौरान भी वह काशी विद्यापीठ में ही ठहरे। छह दिन के प्रवास में उन्होंने 28-29 जुलाई को काशी विद्यापीठ में हुए हरिजन सेवक संघ के सम्मेलन में शिरकत किया, 31जुलाई को हरिजन विद्यार्थियों के बीच उनका अभिनंदन हुआ। दो अगस्त को वह कबीर मठ गए और वहां की स्वच्छता, छुआछूत व अन्य भेदभाव के निषेध के वातावरण से वह काफी प्रभावित हुए।

अंतिम बार यानी अपनी 13वीं यात्रा में वह 21 जनवरी 1942 को काशी पहुंचे। वह अवसर था काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना का रजत जयंती वर्ष। रजत जयंती वर्ष समारोह में उपस्थित होने के बाद कांग्रेसजनों से बातचीत में जल्द बनारस आने का आश्वासन दे कर विदा हुए पर वह उनकी अंतिम यात्रा बन कर रह गई।

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