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हॉकी के जादूगर दादा ध्यानचंद के पुत्र अशोक ने कहा, देश की जनता के सम्मान से बड़ा नहीं भारतरत्न

-बोले, भारतरत्न तो राजनीतिक अवार्ड बन कर रह गया है- दुनिया का अकेला देश भारत जहां मनाया जाता है खेल दिवस

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Major Dhyanchand

Major Dhyanchand

वाराणसी. देश के सबसे बड़े सम्मान भारतरत्न पर फिर एक बार चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है। एक तरफ जहां भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेता वीर सावरकर को भारतरत्न देने की वकालत करने में जुटे हैं कुछ राजनेता ही इस पर सवाल खड़ा कर रहे हैं। इसी दरम्यान खेल की दुनिया में भारत को विश्व भर में बादशाहत दिलाने वाले मेजर ध्यानचंद के पुत्र पूर्व ओलंपियन अशोक कुमार कहते हैं कि यह सम्मान सिविलियन नहीं बल्कि पूरी तरह से राजनीतिक हो गया है।

वह कहते हैं कि दादा मेजर ध्यानचंद को यूं ही हॉकी का जादूगर नहीं कहा जाता है। उनका खेल ही था जिसकी बदौलत भारत लगातार 6 बार ओलंपिक गोल्ड मेडल जीत सका। वही थे जिन्होंने हॉकी की बदौलत दुनिया भर में भारत का लोहा मनवाया। लेकिन भारत सरकार ने उन्हें आज तक भारतरत्न सम्मान से नहीं नवाजा। हां! 1956 में उन्हें पद्मभूषण से जरूर सम्मानित किया गया। हालांकि उसके बाद तीन बार जिसमें से दो बार कांग्रेस नेता सुरेश कलमाड़ी और जितेंद्र सिंह तथा 2017 में भाजपा नेता विजय गोयल ने दादा को भारतरत्न देने की पहल की लेकिन हुआ कुछ नहीं बस बातें ही बातें रह गईं।

अशोक कुमार कहते हैं कि देश की जनता दादा का सम्मान करती है। दुनिया भर में भारत ही अकेला देश है जहां खेल दिवस मनाया जाता है और यह दिन दादा, मेजर ध्यानचंद को समर्पित है। यह कम नहीं है। देश की जनता जो सम्मान देती आ रही है उससे बड़ा कोई और सम्मान नहीं हो सकता।

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में आयोजित पूर्व क्षेत्र अंतर विश्वविद्यालय हॉकी प्रतियोगिता के समापन के मौके पर बनारस आए अशोक कुमार ने मीडिया से बातचीत में कहा कि 1928 में देश के विभिन्न राज्यों में हॉकी के प्रसार का श्रेय दादा ध्यानचंद को जाता है। यह उन्हीं का प्रयास था कि भारत ने अब तक ओलंपिक में 8 गोल्ड मेडल जीता। वह भारतीय हॉकी स्वर्णिम युग रहा है। तब देश में हॉकी अकादमी नहीं होती थी। तब हॉकी स्कूलों में, गांवों में और क्लबों में खेली जाती थी। ग्रासरूट से हॉकी के खिलाड़ी पैदा होते थे जो हॉकी की रीढ बनते रहे। यह दौर 1978 तक चला।

उन्होंने कहा कि हॉकी में भारत के दबदबे को खत्म करने के लिए ही यूरोपीय देशों ने एस्ट्रोटर्फ पर हॉकी खेलनी शुरू की, हालांकि शरुआती दौर में अमेरिका ने इसका विरोध किया लेकिन भारत मजबूत तरीके से अमेरिका का साथ नहीं दे सका जिसके चलते मिट्टी के मैदान की हॉकी एस्ट्रोटर्फ पर खेली जाने लगी। नतीजा सामने है। बताया कि दरअसल मैदान की हॉकी कलाई के बल पर खेली जाती थी वह कलात्मक हॉकी थी। वही एस्ट्रोटर्फ की हॉकी में स्टेमना की जरूरत होती है। इसमें भारतीय खिलाड़ी पिछड़ गए। दूसरे भारत में जितने हॉकी खिलाड़ी हैं उसकी तुलना में अब तक एस्ट्रोटर्फ नहीं है।

वर्तमान हॉकी टीम से काफी आशान्वित अशोक कुमार ने कहा कि सरदार सिंह के जाने से अनुभव की कमी जरूर महसूस की जा रही है फिर भी मनदीप सिंह, वीरेंद्र लकरा जैसे खिलाड़ी है जिनके अनुभव का लाभ मिलेगा। कहा कि भारतीय टीम अच्छा प्रदर्शन कर रही है। अब ओलंपिक क्वालीफाई करने के लिए आस्ट्रेलिया से मुकाबला होना है उम्मीद है कि वह मुकाबला जीत कर भारत ओलंपिक के लिए क्वालीफाई कर लेगा और इस बार पदक भी जीतेगा। टीम विश्वास और जोश से लबरेज है।