
आज है मां की तेरहवीं, बेटे ने ब्रह्मभोज कराने की बजाय किया ये काम, फिर कार्ड पर लिखी ये मार्मिक बात...लोग कर रहे खूब तारीफ
वाराणसी. बनारस शहर के सुंदरपुर के लास बृज इन्क्लेव में रहने वाले सत्येंद्र नारायण राय की मां की आज यानी गुरुवार को तेरहवीं है। चार अप्रैल को मां के निधन के बाद से ही परिवार के लोग पशोपेश में थे कि मां का श्राद्ध कर्म दान भोज करने में किसी तरह की कमी न रह जाये। लेकिन महामारी की विपदा को देखते हुए बेटे सत्येन्द्र नारायण ने निर्णय लिया कि वे ब्रह्मभोज कराने की बजाय उन गरीबों के लिए भोजन का प्रबंध करेंगे जो इस आपदा में भूखे हैं। उन्होंने रोटी बैंक नाम की संस्था को बुलाकर दो हजार लोगों का राशन दिया। जिससे बना खाना गरीबों तक पहुंच सके।
कार्ड बांटकर मां के लिए मांगी दुआ
बेटे ने तय तो पहले ही कर लिया था की वो इस अपव्यय को रोककर गरीबों का सहारा बनेंगे, लेकिन बावजूद इसके उन्होंने बकायदा तेरहवी का कार्ड भी छपवाया। जिस पर लिखा 'लॉकडाउन के चलते तेरहवी के ब्रह्मभोज के लिए मेरे घर आने की आवश्यकता नहीं। आप अपने घर से ही मृतात्मा की शांति के लिए प्रार्थना करें। राय के इस निर्णय की बनारस में तारीफ हो रही है।
लोगों ने कहा- हो रही नई शुरुआत
रोटी बैंक के सदस्य किशोर तिवारी ने बताया कि सत्येन्द्र की तरफ से 2000 लोगों के भोजन का सामना दिया गया। इसे बंटवाया जाएगा। डा. ओझा ने बताया कि इस प्रकार की स्वस्थ परंपरा से समाज में एक नई दिशा व लोगों को प्रेरणा मिलेगी।
हिन्दू समाज में मृत्योपरांत ये हैं मान्यताएं
हिंदू समाज में मान्यता है कि निराश्रितों और गरीबों को कराया गया भोजन मृत आत्मा तक पहुंचता है। इसलिए मृत्यु के 13वें दिन ब्रह्मभोज आयोजन की परंपरा है। भारतीय वैदिक परंपरा के सोलह संस्कारों में मृत्यु यानी अंतिम संस्कार भी शामिल है। इसके अंतर्गत मृतक के अग्नि या अंतिम संस्कार के साथ कपाल क्रिया, पिंडदान आदि किया जाता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार तीन या चार दिन बाद श्मशान से मृतक की अस्थियों का संचय किया जाता है। सातवें या आठवें दिन इन अस्थियों को गंगा, नर्मदा या अन्य पवित्र नदी में विसर्जित किया जाता है। दसवें दिन घर की सफाई या लिपाई-पुताई की जाती है। इसे दशगात्र के नाम से जाना जाता है। इसके बाद एकादशगात्र को पीपल के वृक्ष के नीचे पूजन, पिंडदान व महापात्र को दान आदि किया जाता है। द्वादश गात्र में गंगा जल से पूजन होता है। गंगा के पवित्र जल को घर में छिड़का जाता है। अगले दिन त्रयोदशी पर तेरह ब्राम्हणों, पूज्य जनों, रिश्तेदारों और समाज के लोगों को सामूहिक रूप से भोजन कराया जाता है। इसे ही ब्रह्मभोज कहते हैं।
Published on:
16 Apr 2020 08:51 am
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