
Bhasma Holi
पत्रिका न्यूज नेटवक्त.
वाराणसी. काशी की होली (Kashi Holi) का भी अपना महत्व है। खासतौर पर मसाने की होली, जहां न रंग, न पिचकारी और न ही गुलाल का उपयोग होता है। यहां भोले बाबा के भक्त चिता की भस्म से होली खेलते हैं। रंगभरी एकदाशी के अलगे दिन यानी फाल्गुल शुक्ल द्वादशी को महाश्मशानपर चिता भस्म के साथ होली खेली जाती है। यह होली भगवान महाश्मशानाथ मतलब भूत भावनशंकर अपने गणों भूत-प्रेत, पिशाच, यक्ष, गंधर्व, राक्षस आदि के साथ खेलते हैं। शिवपुराण और दुर्गा सप्तशती में इसका उल्लेख भी मिलता है। इसके लिए कहा जाता है कि खुद भूतभावन भगवान शंकर ने अपने अति प्रियगणों को मनुष्यों और देवी देवाताओं से दूर रहने का आदेश दे रखा है। लिहाजा रंग भरी एकादशी में जब देवता और मनुष्य बाबा के साथ होली खेलते हैं तो वो इससे अलग रहते हैं। ऐसे में वो अगले दिन मणिकर्णिकातीर्थ पर बाबा के साथ चिताभस्म की होली खेलते हैं।
इस संबंध में श्री श्री 1008 महाश्मशाननाथ सेवा समिति के व्यवस्था कगुलशन कपूर ने बताते हैं कि अपने नियमित कार्यक्रम के तहत आदि देव शंकर दोपहर में स्नान के लिए मणिकर्णिकातीर्थ पर पहुंचते हैं। स्नान के बाद महाश्मशान नाथ की आरती और बाबा को भस्म अर्पित किया जाता है। फिर 51 वाद्ययंत्रों के बीच आरती होती है। उसके बाद जलती चिताओं के साथ भोलेनाथ अपने प्रिय विशिष्ट भक्तों के साथ चिता भस्म की होली खेलते हैं।
चिताओं के बीच चिता की भस्म की होली-
कहते हैं साल में एक बार होलिका दहन होता है, लेकिन महाकाल स्वरूप भोलेनाथ की होली रोज होती है। फाल्गुन शुक्ल द्वादशी को भगवान भोलेनाथ अपने औघड़ रूप में काशी के महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर जलती चिताओं के बीच चिता की भस्म की होली खेलते हैं। महाश्मशान पर एक तरफ जहां चिताएं जलती रहती हैं वहीं फ़िजाओं में डमरू की गूंज और हर-हर महादेव की अनगूंज भी सुनाई देती रहती है। भांग, पान और ठंडई की जुगलबंदी के बीच अल्हड़ मस्ती और हुल्लड़ बाजी के बीच हर कोई एक दूसरे को मणिकर्णिका घाट का भस्म लगाता है। इस मौके पर विदेशी सैलानी भी जम कर इसका आनंद लेते हैं।
जिनका शव आता उन्हें मिलती है मुक्ति-
विश्वनाथ खुद भक्तों संग महाश्माशन पर होली खेलते हैं। कहा जाता है कि मृत्यु के बाद जो भी शवमणिकर्णिका घाट पर दाह संस्कार के लिए आते हैं, बाबा उन्हें मुक्ति प्रदान करते हैं। कहा यह भी गया है कि महाश्मशान मणिकर्णिका तीर्थ पर आने वाले हर शव को बाबा मोक्ष प्रदान करते हैं। फिर जिस राम-नाम के जप के साथ शव महाश्मशान पहुंचता है तो शिव अपने आराध्य राम के पांव की धूल रूपी चिताभस्म को माथे पर लगा कर मर्यादा पुरुषोत्तम को यथोचित सम्मान देते हैं।
ब्रज और काशी की होली में अंतर-
पद्म विभूषण से सम्मानित पंडित छन्नूलाल मिश्र ने पत्रिका से बातचीत में बताया कि ब्रज और काशी की होली में बड़ा अंतर है। ब्रज की होली भगवान कृष्ण गोप और गोपियों संग खेलते हैं और उसमें रंग व पिचकारी का प्रयोग होता है जबकि काशी में भगवान शिव की होली में न वस्त्र होता है, न पिचकारी, न कुछ और। भोले नाथ अपने साथियों भूत-पिशाच संग होरी खेलते हैं। बताया कि यूं तो संसार में साल में एक बार होलिका दहन होता है लेकिन,बनारस में मणिकर्णिका तीर्थ पर रोज होलिका दहन होता है। मसाने की होरी के बारे में वह कहते हैं कि गोप न गोपी, नश्याम न राधा, न कोई रोग न कौनो बाधा। इसमें सब शामिल हो सकते हैं बस औरतों का जना मना है, क्योंकि यहां बताया गया है कि न साजन ना गोरी, अर्थात विवाह आदि करके जोड़े इस होरी में शामिल नहीं हो सकते।
Published on:
23 Mar 2021 07:59 pm
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