
अटल जी कोई साधारण मनुष्य नहीं वरन महामानव थे। स्मृति स्थल पर पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ उनकी अंत्येष्टि कर दी गई। इस मौके पर देश भर के राजनेता (पक्ष-विपक्ष) सभी के नेत्र सजल हो उठे थे। ये तो दिल्ली का हाल था, यहां बनारस में जो उन्हें अति प्रिय था वहां भी लोग टकटकी लगाए टीवी पर अपने अनन्य प्रिय नेता के पार्थिव शरीर को पंचतत्व में विलीन होता देख बिलख पड़े। बस रह गईं तो स्मृतियां। उन्हीं स्मृतियों को वर्षों से सहेजे काशी के महान संगीतकार डॉ राजेश्वर आचार्य ने कहा, अब तो ये स्मृतियां ही रह गईं शेष। ये भी पढें- अजातशत्रु अटल बिहारी को काशी में श्रद्धांजलि देने को लगी होड़, कांग्रेसजनों ने भी दी श्रद्धांजलि

थे नेता प्रतिपक्ष पर साहित्यिक मंच पर कवि ही बन कर रहेदेश की सांस्कृतिक राजधानी काशी में एक साहित्यक समागम हुआ। बात 1994 की है, तब अटल जी नेता प्रतिपक्ष हुआ करते थे। वह बनारस आए थे। इसका साक्षी है कमलाकर चौबे आदर्श इंटर कॉलेज का मैदान। काशी के जलतरंग वाद्ययंत्र से लोगों का मन मोह लेने वाले डॉ. राजेश्वर आचार्य बताते हैं कि राष्ट्रीय कला साधक संगम काशी में आयोजित हुआ था, जिसमें संस्कार भारती द्वादश राष्ट्रीय अधिवेशन स्मारिका भी प्रकाशित हुई थी। स्मारिका का विमोचन खुद अटल बिहारी वाजेपयी ने किया था। स्मारिका मेरे द्वारा लिखी गई थी जिसे ‘कला साधक संगम’ के आयोजन में देश भर के कलाकारों ने अपनी कला का परिचय देते हुए सहभाग किया था। स्मारिका में तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष के रूप में अटल जी की भी कविता प्रकाशित हुई थी। इसके बाद हापुड़ में वर्ष 1995 में राष्ट्रीय साहित्यकार सम्मेलन में अटल जी ने मुझे काशी के पल को याद करते हुए बुलाया और साहित्यकार के रूप में सम्मानित करते हुए श्रद्धेय अटल जी ने तिलक लगाया और अंगवस्त्रम ओढा कर सम्मानित किया। आचार्य जी ने कहा कि उस समारोह की कुछ छाया चित्र मैनें बहुत सहेज कर रखा है। उसमें ‘अटल वाणी’ कहने वाले बाजपेयी जी ने मुझे साम्मानित किया है। ये भी पढ़ें-Patrika Exclusive- अटल बिहारी वाजपेयी और काशी, ''काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूं....''

यह राजनीतिक मंच नहीं, जिसे राजनीति करनी हो वह जा सकता हैः अटल बिहारी वाजपेयीसंगीतकार डॉ. राजेश्वर आचार्य बताते हैं कि जब 1994 में राष्ट्रीय कला साधक संगम के समारोह में बतौर मुख्य अतिथि अटल जी आए तो उन्होंने हर बात का जबाब संगीत और कविता से ही दिया। मुझसे यह तक कहा कि मै कुंवारा हूं। वह जिस कार्यक्रम में शिरकत करने आए थे वहां भाजपा नेताओं का जमावड़ा था। अटल जी ने कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करते हुए कहा कि ये कोई राजनैतिक मंच नहीं, यहां राजनीति की बात नहीं होगी। यहां एक समारोह में मैं इस कवि की हैसियत से आया हूं, जिन्हें राजनीति की बात करनी और सुननी हो वो बाहर जा सकते हैं। उसके बाद उन्हें वहां मौजद सभी साहित्यकारों की बात का जबाब अपनी कविता के माध्यम से ही दिया। ये भी पढ़ें- जानिए जब पूर्व अटल बिहारी वाजपेयी ने छुए थे पूर्व मेयर के पांव

अटल जी का काव्य पाठपेड़ के ऊपर चढ़ा आदमी ऊंचा दिखाई देता है। जड़ में खड़ा आदमी नीचा दिखाई देता है। आदमी न ऊंचा होता है, न नीचा होता है, न बड़ा होता है, न छोटा होता है। आदमी सिर्फ आदमी होता है। पता नहीं, इस सीधे-सपाट सत्य को दुनिया क्यों नहीं जानती है?और अगर जानती है, तो मन से क्यों नहीं मानती इससे फर्क नहीं पड़ता कि आदमी कहां खड़ा है ? पथ पर या रथ पर ? तीर पर या प्राचीर पर ? फर्क इससे पड़ता है कि जहां खड़ा है, या जहां उसे खड़ा होना पड़ा है, वहां उसका धरातल क्या है? ये भी पढ़ें- तब BJP विधायक कृष्णानंद राय की हत्या के बाद राजनाथ सिंह का अनशन तुड़वाने बनारस आए थे अटल बिहारी