
वाराणसी में प्रदूषण के कारक
डॉ अजय कृष्ण चतुर्वेदी
वाराणसी. आगामी 05 जून को हम सभी फिर मनाएंगे पर्यावरण दिवस। वन विभाग से लेकर नगर निगम और जिला प्रशासन क्या अब तो मंत्री तक ने तैयारी कर ली है बृहद पौधरोपण की। लेकिन क्या एक दिन पौधे रोप देने भर से पर्यावरण शुद्ध हो जाएगा। देश, राजधानी दिल्ली एनसीआर में पर्यावरण संरक्षण के लिए हाय तौबा मचाता है। लेकिन अब तक विश्व स्वास्थ्य संगठन भी कह चुका है कि दिल्ली ही नहीं बनारस भी पर्यावरण प्रदूषण में किसी से कम नहीं। आलम यह है कि पिछले छह महीने के आंकड़े बताते हैं कि 180 दिन में काशीवासियों को महज 13 दिन ही बमुश्किल शुद्ध हवा मिल पाई है जबकि 131 दिन बदतर हवा में काशी के लोगों ने सांस ली है। इस भयानक स्थिति का आलम यह है कि पहले लोग अस्थमा और हृदय रोग की चपेट में आ रहे थे, लेकिन अब तो शरीर का हर अंग इसकी चपेट में आ गया है। इस शहर में स्किन डिजीजी वालों की तादाद लगातार बढ रही है। लेकिन अब उससे भी कहीं ज्यादा खतरनाक स्थिति में पहुंच गई है काशी। अब इस काशी में मोटर न्यूरॉन्स डिजीज (एमएनडी) का खतरा बढ़ने लगा है। एक ऐसी बीमारी जिसका कोई इलाज ही नहीं दुनिया भर में। एक बारगी इसकी गिरफ्त में आने के बाद इंसान तिल-तिल कर मरता है। ऐसे मरीजों की उम्र भी ज्यादा नहीं होती, महज दो से तीन महीने में ही दुनिया खत्म हो जाती है। पर स्थानीय स्तर पर प्रदूषण नियंत्रण विभाग हो या जिला प्रशासन अथवा नगर निगम या अन्य कार्यदायी संस्था किसी को इसकी चिंता नहीं।
विकास की अंधी दौड़ और प्रकृति से छेडछाड़ किस कदर घातक हो सकती है इसका ताजा तरीन उदाहरण है मोटर न्यूरॉन्स डिजीज। जल से जंगल तक को बर्बाद और तबाह करने का परिणाम सामने दिखने लगा है। आकाश से पाताल तक में लगातार फैल रहा प्रदूषण का जहर कितना घातक हो सकता है यह भी परोक्ष और अपरोक्ष रूप से दिखने लगा है। प्रदूषण चाहे जल का हो या वायु का वह इतना घातक स्तर तक पहुंच गया है कि अब ऐसी-ऐसी बीमारियों का असर दिखने लगा है जिनका कोई इलाज ही नहीं है। एक बार ऐसे रोगों की चपेट में आए तो मरना तय है। यह रोग ज्यादा वक्त भी नहीं देता।
अब तो केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ( सीपीसीबी) ने एक और अलर्ट जारी कर चेता दिया है। कहा है कि लगातार जाम व धुएं के कारण सबसे ज्यादा प्रदूषण के चपेट में लोग आ रहे हैं। इससे फेफड़ा, अस्थमा व हृदय को सर्वाधिक खतरा है। अब भी न चेते तो आने वाले दिनों में स्थिति भयावह हो जाएगी।
प्रमुख कारण
1-रिपोर्ट के अनुसार काशी को अभी इससे निजात नहीं मिलने वाली है। कारण जारी विकास कार्य। और ऊपर से ध्वस्त ट्रैफिक व्यवस्था। इन दोनों का खामियाजा भुगत रहे हैं शहरवासी। हाल यह है कि शहर से लेकर गांव तक जहां तक निगाह जाती है सिर्फ और सिर्फ खोदाई ही नजर आती है और फ़िज़ा में धूल। धूल में इतने महीन कण होते है जो मनुष्य के फेफड़ों पर सीधा असर करता है। निर्माण सामग्री को भी बंद कमरे में नहीं रखा जाता है वहां से भी हानिकारक कण हवा में फैलते हैं।
2-काशीवासियों का दिल छलनी करने में बदहाल ट्रैफिक सिस्टम भी कम मददगार नहीं। वाहनों से निकलने वाला विषैला धुआं सीधे फेफड़ों को संक्रमित कर रहा है। जाम में सभी वाहन हमेशा चालू रहते हैं ऐसे में और जहरीला धुआं निकलता है। जिले में करीब पौने नौ लाख वाहन है। पर नियंत्रण कोई नहीं।
3-नगर निगम को मानों शहरवासियों की सेहत की रंच मात्र भी परवाह नहीं। जहां तहां कूड़े जला दिए जा रहे हैं। ये तब है जब डीएम का सख्त आदेश है कि कहीं भी कूड़े में आग न लगाई जाए। दरअसल कूड़े की आग का धुआं बहुत ऊपर तक नहीं जाता इससे यह हानिकारक होता है। बीएचयू के चिकित्सक कई बार कह चुके है कि बनारस और आस-पास के लोगों के फेफड़े के कारण 20 प्रतिशत लटक रहे हैं।
4-शहर पूरी तरह से कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो चुका है। हरियाली कहीं नहीं दिखेगी। बाबतपुर से गाजीपुर रोड तक इस गर्मी में एक ऐसी जगह नहीं जहां छाया मिल जाए। बाबतपुर-शिवपुर रोड पर खजूर के पेड़ लगाए गए हैं जिनका पर्यावरण से कोई सरोकार नहीं। छाया की तो बात ही बेमानी है।
5-ऐसा नहीं कि सिर्फ वायु ही प्रदूषित है। यहां का जल भी अब पूरी तरह से प्रदूषित हो गया है। बीएचयू, आईएमएस के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ विजय नाथ मिश्र ने पत्रिका को बताया कि डीजल रेल इंजन कारखाना में शोधन यंत्र है बावजूद इसके वहां से निकलने वाला क्रोमियम असि नदी से होते गंगा में जा रहा है जो मोटर न्यूरॉन्स डिजीज को बढ़ा रहा है। ओपीडी में इसके रोगियों की तादाद लगातार बढ़ रही है। इस पर अंकुश न लगा तो भविष्य में बनारस ही नहीं बनारस से आगे बलिया तक के लोग इसकी चपेट में आएंगे जिन्हें बचा पाना आसान नहीं होगा। क्रोमियम मोटर न्यूरॉन्स डिजीज के प्रसार में सर्वाधिक मददगार है।
प्रो. मिश्रा बताते है कि न्यूरोलॉजी विभाग के पास 168 इसके मरीज है जो बगैर दवा के कभी भी मरने की स्थिति में है। उन्होंने कहा कि इस बीमारी को लेकर गंभीर शोध की जरुरत है ताकि मरते मरीजों को बचाया जा सके। उन्होंने कहा कि क्रोमियम और निकिल का उपयोग पेंटिंग में किया जाता है। बनारस में पेंटिंग का कारखाना सबसे बड़ा डीएलडब्ल्यू है, जिसका कचरा नगवां नाले से होकर गंगा में गिरता है। और वही से 500 मीटर दूर भदैनी पम्प से बनारस को पानी सप्लाई होता है यह बेहद चिंताजनक बात है। इससे घोर निराशा है न्यूरोलॉजी विभाग में।
Published on:
02 Jun 2018 02:14 pm
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