बिस्मिल्लाह खां शहनाई पर कुछ खास नोहे की धुन बजाते थे। उनमें से एक था 'मारा गया है तीर से बच्चा रबाब का, बच्चा भी वो जो पार ए दिल था रबाब का' व 'रो रो कहती है थी जहरा की जाई, घर चलो करबला वाले भाई’ और 'परदेस में बहन को चले किस पे छोड़कर, भैया हुसैन जाते हो क्यों मुंह को मोड़कर’ आदि कुछ खास नौहे थे जिन्हें वह आठवीं मुहर्रम को शहनाई पर बजाया करते थे।