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Premchand Jayanti samaroh: कथा सम्राट प्रेमचंद जयंती पर लमही में लगा मेला, जीवंत हुए मैकू, जियावन और घीसू

कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद का गांव लमही अब शहर का हिस्सा बन गया है। ऐसे में ये पहला मौका रहा जब शहरी आबो-हवा के बीच कथा सम्राट की जयंती पर मेला लगा। हालांकि जयंती समारोह प्रेमचंद स्मारक की बजाय रामलीला मैदान में आयोजित किया गया। स्मारक स्थल पर चुनिंदा लोगों को ही आमंत्रित किया गया था।

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कथा सम्राट प्रेमचंद जयंती पर लमही में लगा मेला, जीवंत हुए मैकू, जियावन और घीसू

कथा सम्राट प्रेमचंद जयंती पर लमही में लगा मेला, जीवंत हुए मैकू, जियावन और घीसू

वाराणसी. बदलते बनारस में अब कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद का गांव लमही भी अब शहरी हो चला है। ऐसे में कंक्रीट के जंगलों में स्थित रामलीला मैदान पर कथा सम्राट की जयंती पर मेला लगा। हालांकि कोरोना काल के दो वर्ष बाद आयोजित मेला में काफी लोग जुटे। लेकिन यहां आए लोगों को तब निराशा हाथ लगी जब पांच करोड़ की लागत से निर्मित और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय द्वारा संचालित प्रेमचंद शोध संस्थान में हर किसी को जाने की इजाजत नहीं रही। महज चुनिंदा लोग ही वहां पहुंच सके।

शोध संस्थान में जाने को साहित्यकारों ने जताया विरोध की नारेबाजी

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय द्वारा संचालित मुंशी प्रेमचंद शोध संस्थान में प्रवेश के लिए जब कुछ चुनिंदा लोगों को ही प्रवेश मिला तो वहां पहुंचे साहित्यकारों को ये काफी नागवार लगा। ऐसे में उन्होंने नारेबाजी की। दरअसल साहित्यकारों ने जब मुंशीजी की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर शोध संस्थान में चल रहे बौद्धिक आयोजन में शामिल होने की कोशिश की तो सुरक्षा गार्ड ने द्वार खोलने से इंकार कर दिया। इससे खफा पूर्व जज चंद्रभाल सुकुमार, दुर्गा श्रीवास्तव, प्रो. विजय बहादुर, सुरेंद्र वाजपेयी, प्रमोद सिंह, जय शंकर जय, कुंवर सिंह कुंवर, ईश्वरचंद पटेल, राजन सिंह आदि ने शोध संस्थान के द्वार के समक्ष खड़े होकर मुर्दाबाद के नारे लगाना शुरू कर दिया। शोध संस्थान के बाहर शोर सुन कर आयोजन पक्ष के कुछ वरिष्ठ सदस्य बाहर निकले और साहित्यकारों को नाराज देख उनसे क्षमायाचना की। फिर ससम्मान अंदर ले गए।

जीवंत हुए उपन्यास सम्राट के किरदार

यह सब हिंदी कथा साहित्य के अनन्य सेवक प्रेमचंद की 142वीं जयंती के मौके पर उनके पैतृक गांव लमही में दो साल बाद फिर से उनकी लेखनी जीवंत हुई। रामलीला स्थल पर मैकू, जियावन, घीसू की दीनता, ठाकुर की ज्यादतियों और डा. चड्ढा के अहंकार ने वर्तमान को संदर्भित किया। विषम हालात से जूझती निर्मला का दर्द छलका तो कभी मुंशीजी की कहानियों के बहुचर्चित किरदार जोखू, हरिया, गंगी और भीमा की विडंबनाओं ने आकार लिया। भोंदू, बिसुआ, भगत की संवेदनशीलता और सहजता को भी वर्तमान समय-स्वभाव के अनुसार स्थान मिला।

रंगकर्मियों की प्रस्तुति रही यादगार

संस्कृति विभाग की ओर से आयोजित लमही महोत्वस के मौके पर नगर की कई प्रतिष्ठित रंगकर्म संस्थाओं और कलाकारों ने यादगार प्रस्तुतियां दीं। वहीं ग्रामीण बच्चों और महिलाओं का हुजूम इन प्रस्तुतियों का साक्षी बना। बुजुर्ग महिलाओं से लेकर छोटे-छोटे बच्चों तक में प्रेमचंद की कहानियों पर आधारित प्रस्तुतियों के प्रति समान रूप से उस्तुकता दिखी।

मुंशी जी के चहेतों का लगा जमघट

इस मौके पर साहित्यकार, कलाकार, रंगकर्मी तो लमही महोत्सव में पहुंचे ही, जिले के आला अफसरों ने भी उपस्थिति दर्ज कराई। लमही आने वालों में कुछ ऐसे भी थे जो करीब एक दशक बाद आए थे। वो सभी अपनी पुरानी स्मृतियों में रची-बसी लमही को तलाश करते नजर आए। कोई मुंशीजी के पैतृक आवास के कमरों और खिड़कियों को निहारने में तल्लीन नजर आया तो कुछ शहरी युवा कलाकारों का समूह मुंशीजी के आवास की छत पर चढ़ कर फोटो सेशन में व्यस्त दिखे।

छात्रों ने मुंशी जी के घर का कोना-कोना छान मारा

वहीं सनबीम स्कूल वरुणा के विद्यार्थी भी मौके पर पहुंचे थे। उनके आकर्षण का केंद्र मुंशी जी की आवास था। लिहाजा इन विद्यार्थियों नेमुंशीजी के घर का कोना कोना छान मारा। वहीं कथाकार, साहित्याकर, पत्रकार मुंशी प्रेमचंद के पैतृक आवास के आंगन के पूरबी छोर वाले दालान में शायर कुंवर सिंह कुंवर ने अपनी गजलों और नज्मों से हाल ए लमही बयां कर लोगों के अंतःमन को झकझोरा।