
Nag Nathiya Lila
वाराणसी. काशी इसीलिए धर्म नगरी है। यहां सिर्फ भोले नाथ ही नहीं पूजे जाते बल्कि शिव की इस नगरी में हर देवी-देवता का वैसे ही पूजन-अर्चन व लीला होती है। हालांकि काशी की ज्यादातर लीलाओं को शुरू करने का श्रेय गोस्वामी तुलसी दास को जाता है। उन्होंने यहां न केवल रामचरित मानस की रचना की। न केवल भगवान श्री राम की लीला शुरू कराई बल्कि उन्होंने श्री कृष्ण लीला की भी शुरूआत की। इसके यह लीला 494 वर्ष से अनवरत मनाई जा रही है। इसकी एक कड़ी जिसे देखने के लिए श्रद्धालु दूर-दूर से यहां पहुंचते हैं। यह लीला होती है तुलसी घाट पर। यहां कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को होने वाली इस लीला को देखने के लिए 31 अक्टूबर को आस्था का जो सैलाब उमड़ा उसे शब्दों में नहीं बांधा जा सकता। गुरुवार को उत्तर वाहिनी गंगा जमुना में तब्दील हुईं और उसके तट पर श्री कृष्ण सखाओं संग कंदुक क्रीड़ा (गेंद खेलना) में मग्न हो गए। श्री कृष्ण के बाल स्वरूप में हुई यह लीला भी अद्भुत रही।
फिर खेलते-खेलते जब गेंद यमुना में गई और श्री कृष्ण ने कदंब की डार से जमुना रूपी गंगा में छलांग लगाई मौजूद दर्शकों की सांसें जैसे थम सी गई। चारों तरफ सन्नाटा पसर गया। कुछ देर तक तुलसी घाट का माहौल ऐसा था कि सुई गिरे तो सुनाई दे जाए। सभी श्रद्धालु एक टक जमुना रूपी गंगा में टकटकी लगाए रहे। तभी श्री कृष्ण जहरीले कालिया नाग नथ कर उसके फन पर सवार बंशी बजाते दिखे और पूरा वायुमंडल श्री कृष्ण के जयकारे से गूंज उठा।
ऐसा लगा मानों प्रदूषण रूपी फुंफकारों से यमुना के प्रवाह और गोकुल-वृंदावन की आबो हवा में जहर घोल रहे कालिया नाग का दर्प भंग कर पर्यावरण पुरूष भगवान श्रीकृष्ण ने फिर एक बार प्रकृति के संरक्षण का संदेश दिया हो। तकरीबन पांच सौ साल पहले गोस्वामीतुलसीदास जी द्वारा शुरू की गई श्रीकृष्ण लीला की इस परंपरागत झांकी का दर्शन करने के लिए मानो पूरी काशी ही नहीं वरन् समूचा पूर्वांचल तुलसीघाट पर उमड़ आया हो।
परंपरागत रूप से कालिया दाह की इस कृष्ण लीला के साक्षी बने पूर्व काशिराज परिवार के वंशज कुंवर अनंत नारायण। काशी के लक्खा मेलों में शुमार नाग नथैया की लीला बीते करीब 494 सालों की अनमोल थाती है। अस्सीघाट से लेकर निषादराज घाट तक गंगा की गोद में भीड़ से पटी नौकाएं और बजड़े इस बात के गवाह बने। दुनिया में अपने आप में अनूठी पांच मिनट की इस लीला के दर्शन को उमड़ा जनसैलाब उन सैकड़ों विदेशी मेहमानों के लिए एक चमत्कार सरीखा था। जो स्वयं ही लीला की भावपूर्ण झांकी देखकर अभिभूत थें।
इस चमत्कारी लीला के दर्शन के लिए तुलसीघाट पर दोपहर बाद से ही भीड़ जुटने लगी थी। गोधूलि बेला से ठीक पहले 04. 40 बजे कुंवर अनंत नारायण सिंह का काफिला तुलसी घाट के सामने रुका तो समूचा लीला क्षेत्र ‘हर हर महादेव’ के उद्घोष से गूंज उठा। इधर घाट के चौड़े पथरीले प्रस्तर सोपानों पर भगवान श्रीकृष्ण, सुदामा और अन्य मित्रों के बीच कंदुक क्रीड़ा में मग्न थे। खेल-खेल में ही गेंद यमुना रूपी गंगा में जा गिरी। मित्रों ने उलाहने के साथ भगवान श्रीकृष्ण को वह गेंद वापस लाने को कहा और घड़ी की सुइयों के 04.45 पर पहुंचते ही श्री कृष्ण रूप धरे पात्र उफनते कालीय दह मे कूद पड़े। जैसे ही श्री कृष्ण ने यमुना में छलांग लगाई लगा लोगों की धडकने थम सी गई हों। भीड़ में सन्नाटा सा पसर गया। लेकिन कुछ ही पल बाद कालीय का फन नाथकर नृत्य मुद्रा में वंशी बजाते भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य झांकी देख भक्तों ने ऐसा जयकारा लगाया कि जमीन से आसमान तक गूंज उठा।
सम्पूर्ण लीला क्षेत्र वृंदावन बिहारी लाल की जयकारों से गुंजरित हो उठा था। लोगों ने आरती उतारी। ऐसे में घाट से लेकर गंगा उस पार तक हर दिशा में इस आरती ने माहौल को दिव्यता प्रदान कर दी। लोग हाथ जोड़े इस झांकी को अपने अंतःकी गहराइयों तक उतार रहे थे। ढलती शाम योगेश्वर कृष्ण की वंदना के गीत गा रही थी। परंपरा के अनुसार काशी नरेश ने स्वयं आगे बढ़कर भगवान कृष्ण को माल्यार्पण किया उधर अखाड़ा गोस्वामी तुलसीदास के महंत प्रो. विशम्भरनाथ नाथ मिश्र ने समस्त काशीवासियों की ओर से कुंवर अनंत नारायण सिंह को सम्मान पुष्प अर्पित किया।
Published on:
31 Oct 2019 05:43 pm
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