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प्रभु की रेल में आमजन को जगह नहीं

गांधी श्रेणी को ही ला दिया हाशिये पर. जानें क्या है भारतीय रेल का हाल...

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Ajay Chaturvedi

Mar 17, 2016

Indian Railways

Indian Railways

डॉ. अजय कृष्ण चतुर्वेदी
वाराणसी. ये क्या किया प्रभु। गांधी के देश में भारतीय रेल से गांधी श्रेणी ही हाशिये पर। कहां जाए आम यात्री। अरे कुछ तो खयाल रखा होता। ये आवाज है आम भारतीय रेल यात्री की। वो यात्री जो रोजाना दो जून की रोटी के लिए एक से दूसरे जिलों में जाता है। फिर शाम को परिवार में लौटता है। केवल वही नहीं ऐसे लाखों यात्री हैं जिन्हें अचानक कहीं की यात्रा करनी पड़ती है ऐसे भी लोग हैं जो स्लीपर कोच का रिजर्वेशन नहीं करा सकते। लेकिन उन्हें रेल यात्रा करनी पड़ी है। ऐसे लोगों के लिए जनरल कोच ही तो सहारा था। भारतीय रेल में इसे ही तो गांधी श्रेणी कोच कहा जाता रहा है। लेकिन मौजूदा सरकार की निगाह में आम यात्री नहीं, मौजूदा सरकार को रेलवे की आय बढ़ानी है। लिहाजा प्रायः हर ट्रेन से जनरल बोगी के डिब्बों में कर दी कटौती और उसकी जगह बढ़ा दिए स्लीपर कोच। अब आम आदमी एक-दो जनरल बोगी के डब्बों में इस कदर ठूंसा जा रहा है मानों बोगी नहीं मालगोदाम हो जिसमें इंसान को आलू की बोरियों की तरह ठूंसा जा रहा हो।

ये है भारतीय रेल का हाल
ये है मध्यप्रदेश का भोपाल स्टेशन। यात्रियों को इंतजार है मालवा सुपर फास्ट एक्सप्रेस का। ट्रेन करीब 12 बजे प्लेटफार्म नंबर दो पर आ कर रुकती है। लंबी सी ट्रेन। ट्रेन स्टेशन पर रुकती है। यात्रियों का बड़ा झुंड जनरल बोगी तलाशने में जुटता है। कोई इंजन की ओर दौड़ता है तो कोई सबसे पीछे। एक के बाद एक बोगी निकलती जा रही है। एसी प्रथम, एसी द्वितीय, एसी तृतीय, पेंट्री कार। फिर शुरू होता है स्लीपर का क्रम शुरू होता है। एस-1 से शुरू हुआ सिलसिला एस-12 तक जाता है। इतनी लंबी फेहरिस्त के बीच जनरल कोच कहां है कुछ पता ही नहीं। अब जो यात्री ट्रेन के बीच में है वह इंजन की तरफ भागता है। एक डिब्बा है वहां। सब उसी में चढ़ने में जुट जाते हैं। देखते ही देखते इस बोगी का आलम यह कि इस बोगी में इंसान इस तरह से ठुंसे नजर आते हैं जैसे रेल की बोगी न हो कर मालगोदाम हो जिसमें इंसान को आलू के बोरे की तरह ठूंस दिया गया हो।

दो जनरल बोगी वह भी ट्रेन के दो छोर पर
रेलवे प्रशासन की दूरदर्शिता यह कि ट्रेन में दो जनरल बोगी तो लगा दिया मगर वह सीरियल में नहीं है। एसी के सारे कंपार्टमेंट एक क्रम में हैं। स्लीपर कोच एक के बाद एक मिलेंगे पर जनरल बोगी को खोजते रहिये कि ये है कहां। आलम यह कि एक इंजन के पीछे तो दूसरी बोगी गार्ड के डिब्बे के बगल में। अगर एक बोगी में ज्यादा भीड़ है तो दूसरे तक पहुंच भी नहीं सकते। कारण जब तक दूसरी बोगी को खोजेंगे तब तक ट्रेन प्लेटफार्म छोड़ चुकी होगी।
एक पैर पर खड़े हो कर करनी होगी यात्रा
आलम यह कि किसी तरह से अगर जनरल बोगी में घुस गए और एक पैर ही डाला है तो मंजिल तक एक ही पैर पर तपस्या करनी आपकी मजबूरी है। अगर किसी को शौचालय तक जाना है तो नहीं जा सकते। आप को मंजिल आने तक का इंतजार करना पड़ेगा। सबसे दुरूह तो यह कि अगर आप बोगी के बीच फंस गए तो जिस स्टेशन पर उतरना है वहां आप उतर पाएंगे इसकी गारंटी भी नहीं है। ये ऐसा मालगोदाम है जहां माल सिर्फ भरा जाता है। यानी हर स्टेशन पर यात्री चढ़ता ज्यादा है उतरता कम। ऐसे में बोगी में एक वक्त ऐसा भी आएगा कि सांस लेना भी दुश्वार हो जाएगा।

ये है यात्रियों का कहना
मालवा एक्सप्रेस हो या साबरमती एक्सप्रेस। आम यात्री परेशान। एक करीब 70 वर्षीय बुजुर्ग मालवा एक्सप्रेस में किसी तरह घुस जाते हैं। दरवाजे के पास ही लटके हैं। कहते हैं अब तक ऐसा नहीं देखा। बहुत रेल यात्रा की पर ऐसी स्थिति तो इस सरकार में ही देखने को मिल रही है। बताते हैं कि ये केवल मालवा एक्सप्रेस का ही नजारा नहीं है। वर्तमान सरकार ने तो साधारण कोच वाली जनता एक्सप्रेस जैसी ट्रेनें बंद कर दीं। ये सब केवल रेलवे की आय बढ़ाने के चलते किया गया है। रागिनी (32 वर्ष) कहती हैं हम तो दैनिक यात्री हैं। पिछले एक दशक से ट्रेन से ही आती-जाती रही पर अब तो यात्रा करना मुश्किल हो गया है। इधर साबरमती एक्सप्रेस के कुछ यात्री ऐसे मिले जिन्हें जनरल बोगी में जगह नहीं मिली तो वे स्लीपर में चले आए। लेकिन यहां आते ही टीटी मिलता है जो इन पर पेनाल्टी लगाने को तैयार। टीटी यात्री से कहता है ये तो स्लीपर है, यहां जनरल टिकट पर यात्रा नहीं की जा सकती। यात्री परेशान किस प्रभु को याद करे। सबके पास तो ट्विटर एकाउंट नहीं।