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भारत-चीन के रिश्तों में आई दरार तो बनारसी खिलौनों की देश-विदेश तक बढ़ी मांग, 30 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ा लकड़ी कारोबार

- अब चीनी खिलौनों पर भी प्रतिबंध लगाने की चल रही तैयारियां - बढ़ती तकनीकी ने बनारस के काष्ठ व्यवसाय को काफी हद तक बढ़ाया- सबसे ज्यादा पसंद की जा रहीं लकड़ी से तैयार मूर्तियां

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भारत-चीन के रिश्तों में आई दरार तो बनारसी खिलौनों की देश-विदेश तक बढ़ी मांग, 30 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ा लकड़ी कारोबार

भारत-चीन के रिश्तों में आई दरार तो बनारसी खिलौनों की देश-विदेश तक बढ़ी मांग, 30 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ा लकड़ी कारोबार

पत्रिका न्यूज न्टवर्क
वाराणसी. देशभर में कई चीनी उत्पादों पर प्रतिबंध के बाद अब चीनी खिलौनों पर भी प्रतिबंध लगाने की तैयारियां चल रही हैं। बाजार से चीनी खिलौनों के गायब होने पर अब बनारसी लकड़ी के खिलौनों की मांग देश सहित विदेशों में भी बढ़ेगी। बनारस की काष्ठ-कला (लकड़ी से बनी मूर्तियां) पूरी दुनिया में मशहूर है। यहां बने लकड़ी के तरह-तरह के खिलौनों, रेलगाड़ी, गुड़िया, सिंदूरदान, चूड़ीकेस के अलावा सजावटी सामान इंटीरियर डेकोरेशन में भी काफी प्रयोग होता है। इस काष्ठ कला ने दुनिया में बनारस को एक अलग पहचान दी है। जीआई (जियोग्राफिकल इंडीकेशन) टैग मिलने के बाद बनारस का लकड़ी कारोबार 30 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ गया है। अभी बनारस का यह कारोबार सालाना 30 करोड़ रुपए का आंका जा रहा है।

हस्तशिल्प कलाकार अब इस कारोबार को और भी बढ़ने का अनुमान जता रहे हैं। शहर के कश्मीरीगंज, खोजवां इलाके में बड़े स्तर पर लकड़ी के खिलौने बनाए जाते हैं, जबकि लहरतारा, कॉरोअमा गांव में फ्लावर पॉट, नकासी पर किए गए ऐंटीक आइटम बनाए जाते हैं। यह आइटम विदेशों में खूब पसंद किए जाते हैं।शहर का कश्मीरीगंज इलाका लकड़ी के खिलौने बनाने का प्रमुख केंद्र माना जाता है। लकड़ी के खिलौने बनाने वाली खराद की मशीनें नवापुरा, जगतगंज, बड़ागांव, हरहुआ, लक्सा, दारानगर में भी चलती हैं। यहां तीन हजार से अधिक कारीगर जंगली लकड़ी 'कोरैया' से कई प्रकार के खिलौने तैयार करते हैं। खोजवां के कश्मीरीगंज में बड़े स्तर पर लकड़ी के खिलौने बनाए जाते हैं। पांच साल पहले यह कला अपने अंतिम दौर में थी, लेकिन भारत सरकार और विदेशों में बढ़ रही मांग के कारण यह कला फिर से पसंद की जाने लगी है।

हस्तशिल्प कारीगरों को मिलने लगा रोजगार

भारत में तेजी के साथ बढ़ती तकनीकी ने बनारस के काष्ठ व्यवसाय को काफी हद तक बढ़ाया है। बाजार के लिए तरस रहे बनारस के खिलौनों ने अब इंटरनेट के माध्यम से दुनिया में रंग जमाना शुरू कर दिया है। समय के साथ-साथ डिजाइन और स्वरूप बदलने से बनारस के लकड़ी उत्पादों का व्यवसाय बढ़ रहा है। थोक कारोबारियों के आर्डर पर अब इस काम से जुड़े कारीगरों को रोजगार भी मिलने लगा है।

अमेरिका, यूरोप तक है मांग

अब शिल्पियों ने बच्चों की पसंद को देखते हुए सिर्फ लकड़ी के पारंपरिक खिलौने बनाने की बजाय उनके रंग-रूप में काफी बदलाव कर दिया है। जिससे बच्चे खिलौने देखकर उनकी ओर आकर्षित हो। बनारस का अब यह व्यवसाय खिलौनों तक ही सीमित नहीं रह गया बल्कि लकड़ी से घर की साज-सज्जा के खूबसूरत उत्पाद भी तैयार किए जा रहे हैं। यही वजह है कि अब बनारस में बने लकड़ी के खिलौनों और इंटीरियर उत्पाद विदेशी ग्राहकों खासकर जैसे यूरोप व अमेरिका को भी लुभा रहे हैं। लकड़ी से तैयार मूर्तियां भी खासी पसंद की जा रही हैं।

जानिए हस्त शिल्पियों का क्या है कहना

हस्त शिल्पियों का कहना है कि अगर इस कारोबार को आर्थिक मदद मिले तो वह अपना शत-प्रतिशत योगदान देंगे। अभी तो कई दिक्कतें हस्तशिल्पियों के समक्ष आती हैं। जीएसटी में भी छूट मिलनी चाहिए। हस्तशिल्पी रमेशचंद्र विश्वकर्मा का कहना है कि चीनी खिलौनों के बंद होने के बाद अपने यहां के खिलौनों की मांग देशभर में सबसे ज्यादा बढ़ेगी। इसके साथ ही यहां के खिलौने की मांग विदेशों तक बढ़ेगी। हालांकि इस कोरोना काल में कारोबार प्रभावित भी हुआ है लेकिन उम्मीद है कि जल्द ही यह कारोबार रफ्तार पकड़ लेगा। वहीं अशोक कुमार शर्मा का कहना है कि तकनीकी प्रशिक्षण मिलना शुरू हो जाए तो यहां के शिल्पी एक से बढ़कर एक खिलौने बनाना शुरू कर देंगे। बस उन्हें थोड़ी प्रोत्साहन की जरूरत है।

जीआई एक्सपर्ट डॉ रजनीकांत मिश्रा का कहना है कि बनारसी काष्ठ कला की पहचान दुनिया भर में है। चीनी खिलौनों को मात देने में यहां के कारीगर अव्वल है। थोड़ी सी सरकार से यदि इन उद्योगों को राहत मिल जाए और हस्तशिल्प कारीगरों को ट्रेनिंग मिले तो फिर यह उद्योग पूरी दुनिया भर में तेजी के साथ उड़ान भर सकेगा। हुनर की कमी अपने यहां नहीं है।

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