सुभासपा अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर के सगे भाई की पत्नी प्रधानी का चुनाव हारी, 2022 की तैयारियाें को लगा बड़ा झटका

UP Panchayat Election Result 2021: ओम प्रकाश राजभर (Om Prakash Rajbhar) के सगे भाई लखन्दर राजभर की पत्नी रीता राजभर (Om Prakash Rajbhar Brother wife) वाराणसी के पिंडरा क्षेत्र के फतेहपुर गांव से प्रधानी का चुनाव हार (loss Gram Pradhan Election) गई हैं। उन्हें 325 वोट मिले, जबकि उनकी प्रतिद्वन्द्वी सुषमा राजभर 563 वोट पाकर चुनाव जीत गईं।

पत्रिका न्यूज नेटवर्क

वाराणसी. 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में भाजपा सरकार को उखाड़ फेंकने की कवायद में जुटे पूर्व मंत्री व सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर (Om Prakash Rajbhar) पंचायत चुनाव में बड़ा झटका लगा है। वाराणसी में ओम पकाश राजभर के सगे भाई की पत्नी (Om Prakash Rajbhar Brother wife) पिंडरा क्षेत्र के फतेहपुर गांव से चुनाव हार (loss Gram Pradhan Election) गईं। यहां ओम प्रकाश के भाई लखन्दर राजभर की पत्नी रीता राजभर को 325 वोट मिले, जबकी उनके प्रतिद्वन्द्वी कैलाश राजभर की पत्नी सुषमा राजभर 563 वोट पाकर चुनाव जीत गईं।

 

राजभर के परिवार की पंचायत चुनाव में इस हार के कई मायने निकाले जा रहे हैं। एक तरफ विधानसभा चुनाव में सरकार को उखाड़ फेंकने का दावा करने वाले ओम प्रकाश राजभर के लिये यह हार मायने रखती है। 2017 के विधानसभा चुनाव में राजभर की पार्टी सुभासपा (SBSP) ने भाजपा से गठबंधन कर पहली बार जीत का स्वाद चखा था। सात विधायक विधानसभा पहुंचे। ओम प्रकाश राजभर को कैबिनेट मंत्री (Cabinet Minister) का पद तक मिला। पर विवाद के बाद राजभर ने योगी सरकार का साथ छोड़ दिया और अब असदुद्दीन ओवैसी (Asaduddin Owaisi) की एआईएमआईएम (AIMIM) व शिवपाल यादव (Shivpal Yadav) की प्रसपा (PSPL) जैसी पार्टियों का एक गठबंधन बनाकर विधानसभा (UP Vidhan Sabha Chunav) चुनाव में उतरने की कवायद में जुटे हैं। ऐसे में ग्राम प्रधान जैसे छोटे चुनाव में परिवार के सदस्य की हार पार्टी और ओम प्रकाश राजभर के लिये काफी मायने रखती है।


राजभर वोटरों को साधने की कोशिश

यूपी और खासतौर से पूर्वांचल के कई जिलों में राजभर वोटों की अच्छी तादाद है। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी का मानना है कि पूरे देश में राजभर 4 फीसदी हैं तो उत्तर प्रदेश में इनकी तादाद 12 फीसदी है। पूर्वांचल में राजभर वोटरों की संख्या 12 से 22 फीसदी तक मानी जाती है। सुभासपा का दावा रहा है कि यहां राजभर वोटरों पर सुभासपा की मजबूत पकड़ है। यही वजह है कि उनकी पार्टी विधानसभा चुनावाें में करीब दर्जन भर सीटों पर 20 से 25 हजार तक वोट पाती रही है। भाजपा से अलग होने के बाद ओम प्रकाश राजभर लगातार राजभर वोटों को अपने पक्ष में लामबंद करने में जुटे हुए हैं। उधर भाजपा भी इन वोटरों को साधने के लिये कैबिनेट मंत्री अनिल राजभर समेत अपने राजभर नेताओं को आगे बढ़ा रही है। ओम प्रकाश राजभर भी बीजेपी की इस कवायद से चिंतित हैं और लगातार इसकी काट खोजने में जुटे हैं।


2022 में पड़ेगा असर

ओम प्रकाश राजभर बड़ी ही आक्रामकता से बीजेपी की मुखालफत कर रहे हैं। 2022 में उसे हराने के लिये असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम, शिवपाल यादव की पार्टी प्रसपा समेत छोटे दलों को एक मंच पर लाकर गठबंधन तैयार करने में जुटे हैं। ऐसे में विधानसभा चुनावों का ट्रेलर माने जा रहे पंचायत चुनाव में ओम प्रकाश राजभर के सगे भाई की पत्नी का अपने ही गढ़ में हार जाना मायने रखता है। राजभर की 2022 के लिये की जा रही कोशिशों को बड़ा झटका कहा जा रहा है।


राजनीतिक अस्तित्व का संकट

यूं तो सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के नेता ओम प्रकाश राजभर 2002 से लगातार चुनाव लड़ते चले आ रहे थे। पर उन्होंने जीत का स्वाद तब चखा जब 2017 के विधानसभा चुनाव में वो भारतीय जनता पार्टी नीत एनडीए गठबंधन का हिस्सा बने। सात विधायक जीते और कैबिनेट मंत्री का पद भी पाया। पर भाजपा की बढ़ती महत्वकांक्षा को देखते हुए उन्हें पार्टी और अपने राजनीतिक अस्तित्व पर संकट देखते हुए दो साल में ही मंत्री पद छोड़कर गठबंधन से अलग हो गए।


ओम प्रकाश राजभर का सियासी सफर

ओम प्रकाश राजभरने अपने सियसी सफर की शुरुआत 1981में की और कांशीराम से प्रभावित होकर बहुजन समाज पार्टी ज्वाइन की। 1996 में बसपा ने उन्हें वाराणसी का जिलाध्यक्ष बनाया। भदोही का नाम संत रविदास नगर रखे जाने को मुद्दा बनाकर राजभर ने बसपा छोड़ दिया और अपना दल में आए। पर एक साल बाद ही अपनी पार्टी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी बनाकर राजभर वोटों को एकजुट करना शुरू किया। 2004 में यूपी की 14 और बिहार की एक सीट पर प्रत्याशी उतारा। 2007 में 97 सीटों कैंडिडेट खड़े किये जिसमें उन्हें 0.94 प्रतिशत वोट मिले। 2009 का लोकसभ चुनाव अपा दल के गठबंधन 2010 में बिहार विधानसभा चुनाव की छह सीटों पर लड़े। 2012 में मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल के साथ लड़े। कौमी एकता दल तो दो सीटें जीत गई पर सुभासपा को एक भी सीट नहीं मिली। 2014 में देवरिया की सलेमपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़े लेकिन महज 66,068 वोट पाए। 2017 में राजभर एनडीए का हिस्सा बने और भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़े तो पार्टी पहली बार सात सीटें जीती और ओम प्रकाश राजभर कैबिनेट मंत्री बने। अब एक बार फिर ओमप्रकाश राजभर प्रदेश की सियासत में अपने पैर मजबूती से जमाने की कवायद में जुटे हैं।

रफतउद्दीन फरीद
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