
भगवान शिव का मंदिर प्राचीन मंदिरों में से एक है। यह गंगा नदी के पश्चिमी तट पर है। यह 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। काशी विश्वनाथ मंदिर को विश्वेश्वर नाम से भी जाना है। विश्वेश्वर शब्द का अर्थ होता है ‘ब्रह्मांड का शासक’। यह मंदिर पिछले कई हजार वर्षों से वाराणसी में है। मुगल शासकों ने कई बार इसे गिराया।
11वीं सदी में राजा हरीचंद्र ने इसे दोबारा बनाया
कहा जाता है कि इस मंदिर का दोबारा निर्माण 11वीं सदी में राजा हरीशचन्द्र ने करवाया था। 1194 ईसवी में मुहम्मद गौरी ने इसे गिरा दिया था। मंदिर फिर बनाया गया, लेकिन 1447 ईसवी में इसे एक बार फिर जौनपुर के सुल्तान महमूद शाह ने तुड़वा दिया। इतिहास से पता चलता है कि काशी मंदिर के निर्माण और तोड़ने की घटनाएं 11वीं सदी से लेकर 15वीं सदी तक चलती रही। औरंगजेब के ध्वंस के बाद 1777 में रानी अहिल्याबाई होल्कर ने मंदिर का फिर से निर्माण कराया। इसके बाद 11 दिसंबर 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका लोकार्पण किया। दक्षिण भारतीय श्रद्धालुुुओं की आस्था का केंद्र भी है।
उत्तर में काशी का जो महत्व है वही दक्षिण में रामेश्वरम का है
रामेंश्वरम हिंदुओं का एक पवित्र है। यह तमिलनाड के रामाथपुरम जिले में है। यह हिन्दुओं के चार धामों में से एक है। यहां सथापित शिवलिंग 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है। भारत के उत्तर में काशी का जो मान्यता है, वही दक्षिण में रामेश्वरम की है।
भगवान राम ने बनाया था पुल
सीता हरण के बाद भगवान राम ने लंका तक पहुंचने के लिए एक पुल बनाया था। इससे पहले उन्होंने रामेश्वरम में ही समुद्र के किनारे शिवलिंग की स्थापना की थी। इसके बाद पूजा-अर्चना किया। आज भी यह 48 किलोमीटर लंबा पुलिस दिखई देता है। यहां के मंदिर के तीसरे प्रकार का गलियारा विश्व का सबसे लंबा गलियारा है।
केदारघाट, कुमारस्वामी मठ और गौरी-केदारेश्वर मंदिर
काशी के केदार खण्ड का गौरी केदारेश्वर मंदिर है। इस शिवलिंग की एक नहीं बल्कि कई महिमा है। यह शिवलिंग आमतौर पर दिखने वाले बाकी शिवलिंग की तरह ना होकर दो भागों में बंटा हुआ है। एक भाग में भगवान शिव माता पार्वती के साथ वास करते हैं।
दूसरे भाग में भगवान नारायण अपनी अर्धनगिनी माता लक्ष्मी के साथ। यही नहीं इस मंदिर की पूजन विधि भी बाकी मंदिरों की तुलना में अलग है। यहां बिना सिला हुआ वस्त्र पहनकर ही ब्राह्मण चार पहर की आरती करते हैं। गौरी-केदारेश्वर मंदिर में पूजा-अर्चना दक्षिण भारतीय कुमार स्वामी मठ करता है। इसका मैनेजमेंट भी यही मठ करता है। कुमार स्वामी मठ में बाबा केदारेश्वर के लिए रोज खिचड़ी का भोग लगता है।
हनुमान घाट और कांची कामकोटिश्वर
काशी के प्रमुख घाटों में है। ऊपरे भाग में बड़ा हनुमान जी का मंदिर है। मन्यता है कि इसे खुद भगवान श्रीराम ने स्थापित किया था। मुख्य रूप से हनुमान घाट अैर मंदिर ककी पूजा-अर्चना दशनामी जूना अखाड़ा के अधीन है। देखभाल भी जूना अखाड़ा करता है। हनुमान घाट मोहल्ले में बड़ी संख्या में दक्षिण भारतीय मूल के लोग रहते हैं।
अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जिक्र किया था। बोले कि वह बीएचयू के पूर्व कुलपति थे। इनका जन्म मद्रास के चित्तूर जिले के तिरूत्तनी गांव में एक तेलुगु ब्राह्मण परिवार में 5 सितम्बर 1888 को हुआ था। वे भारत के प्रथम उप-राष्ट्रपति (1952 — 1962) और दूसरे राष्ट्रपति रहे।
पीएम मोदी ने तमिनाडु के महान कवि और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सुब्रह्मण्य भारती को याद किया। बोले- काशी में मिशन कॉलेज और जयनारायण कॉलेज में उन्होंने पढ़ाई की थी।
काशी से वह ऐसे जुड़े कि काशी उनका हिस्सा बन गई। वह अपने पापुलर मूंछें भी यहीं रखी थी। ऐसे कितने ही व्यक्तियों ने कितनी पंरपराओं ने कितनी ही आस्थाओं ने काशी और तमिलनाडु को राष्ट्रीय एकता के सूत्र से जोड़कर रखा। अब बीएचयू ने सुब्रह्मण्य भारती के नाम से चेयर की स्थाना की थी।
सुब्रमण्यम भारती का जन्म 11 दिसम्बर, 1882 को तमिलनाडु के तिरूनेवेली जिले के एत्तायापुरम में हुआ था। उनके माता-पिता लक्ष्मी अम्मल और चिन्नसामी अय्यर थे। महाकवि भारती का तमिल भाषा का भी बहुत अच्छा ज्ञान था। उन्होंने 11 साल की उम्र से ही कविता लिखना शुरू कर दिया था।
भारती ने अपने लेख ‘द हिंदी पेज’ में सुझाव दिया था कि प्रत्येक व्यक्ति को हिंदी भाषा सीखनी चाहिए। वे कहते है कि “हम तमिलों को अवश्य हिंदी सीखनी चाहिए।
"आज भी रामानुजाचार्य को याद किया जाता है"
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रामानुजाचार्य को याद किया। उन्होंने कहा कि उनके जैसा संत हजारों मील चलकर काशी से कश्मीर तक की यात्रा करते थे। आज भी उनके ज्ञान को प्रमाण माना जाता है।
रामानुजाचार्य का जन्म आज से लगभग एक हजार साल पहले 1017 ई. में हुआ था। आचार्य रामानुज एक गृहस्थ थे । जब उनको एहसास हुआ की गृहस्थ आश्रम में रहकर अपने लक्ष्य को पान संभव नहीं है, तब ये अपने गृहस्थ जीवन को छोड़कर सन्यासी बन गए और श्री रंगम चले गए
रामनुुजाचार्य ने 7 ग्रंथों की रचना की
रामानुजाचार्य ने पूरे भारत की यात्रा करके भक्ति मार्ग का प्रचार किया । इसके लिए इन्होंने गीता और ब्रहम्सूत्र पर भाष्य लिखा । उन्होंने अपनी सम्पूर्ण यात्रा पैदल चल कर की । इस यात्रा के दौरान उन्होंने कई वैष्णव मंदिरों को संरक्षकों के साथ शास्त्रार्थ किया। कोई भी उनसे जीत नहीं पाया और बाद में वे सभी इनके शिष्य बन गए। इस यात्रा के दौरान उन्होंने 7 ग्रंथों की रचना की ।
रामगोपालचारी की लिखी रामायण और महाभारत पूरा देश प्रेरणा लेता है
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि चक्रवती रामगोपालचारी की लिखी रामायण और महाभारत से पूरा देश प्रेरण लेता है।
चक्रवर्ती राजगोपालचारी का जन्म मद्रास के थोरपल्ली गांव में 10 दिसंबर 1878 को हुआ था। वे राजाजी के नाम से भी जाने जाते हैं। उन्होंने मद्रास कॉलेज से लॉ की डिग्री ली। वे कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में से एक थे। महात्मा गांधी के काफी करीबी माने जाते थे। 1930 में जब गांधी जी ने दांडी मार्च किया, तो इन्होंने भी नमक कानून तोड़ा था।
"पट्टभिराम को काशी के लोग याद करते हैं"
काशी में रह रही तमिलनाडु की एक और महान विभूति पट्टभिराम शास्त्री को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने याद किया। उन्होंने कहा कि वह हनुमान घाट में रहते थे। उन्हें भी काशी के लोग याद करते हैं।
वह भाषाविद, संस्कृत साहित्य और वेद के विद्वान थे। वे राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ के संस्थापक कुलपति थे, जो संस्कृत अध्ययन के लिए समर्पित एक डीम्ड विश्वविद्यालय है। साहित्य और शिक्षा में उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें 1982 में पद्म भूषण से सम्मानित किया था।
तिरुवल्लुवर को दक्षिण भारत का कवि कहते हैं
तिरुवल्लुवर के बारे में पीएम मोदी ने जिक्र किया। तिरुवल्लुवर दक्षिण भारत के महान संत थे। इन्हें दक्षिण भारत का कबीर भी कहा जाता है। शैव, वैष्णव, बौद्ध और जैन सहित हर मत वाले लोग तिरुवल्लुवर को मानते थे।
उन्होंने सन्यास को महत्व नहीं दिया। उनका मानना था कि कोई भी इंसान गृहस्थ रहते हुए भी भगवान में आस्था के साथ पवित्र जीवन जी सकता है। संत तिरुवल्लुवर ने लोगों को जीने की राह दिखाते हुए छोटी-छोटी कविताएं लिखी थीं। जिनको इकट्ठा कर तिरुक्कुलर ग्रंथ में लिखा गया है।
कबीर की तरह इनका जन्म भी एक जुलाहा परिवार में ही हुआ था। संत तिरुवल्लुवर मानव धर्म के प्रति आस्था के लिए पूरी दुनिया में जाने जाते हैं। इनके ग्रंथ तिरुक्कुलर में कबीर की तरह सदाचार, प्रेम, आनंद और एकता के बारे में बताया है। इस तरह उनके और कबीर के जीवन मूल्य एक ही तरह के थे। इन दोनों संतों को हर धर्म और मत वाले लोग मानते हैं। इसलिए तिरुवल्लुवर को दक्षिण का कबीर भी कहा जाता है।
तुलसीदास ने 4 अध्याय काशी में लिखे थे
काशी में गोस्वामी तुलसीदास ने अपना आखिरी समय बिताया था। उन्होंने संकटमोचन की स्थापना की । रामचरित के 7 अध्याय में से 4 अध्याय उन्होंने काशी में ही लिखा था।
Updated on:
20 Nov 2022 12:40 pm
Published on:
20 Nov 2022 12:32 pm
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