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रावण जन्म के साथ अनंत चतुर्दशी को शुरू होगी विश्व प्रसिद्ध रामनगर की राम लीला

-18वीं शताब्दी में शुरू हुई थी रामनगर की रामलीला-कोई एक निश्चित स्थान नहीं है इस लीला का-न लाउड स्पीकर, न झालर बत्ती, लालटेन, मशाल व पेट्रोमैक्स की रोशनी में होती है यह लीला-महीने भर तक चलती है यह रामलीला-पूर्व काशिराज परिवार करता है इस रामलीला का शुभारंभ

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ऐतिहासिक रामनगर की लीला का दृश्य (फाइल फोटो)

ऐतिहासिक रामनगर की लीला का दृश्य (फाइल फोटो)

वाराणसी. धर्म नगरी काशी में ऐसा कोई त्योहार नहीं जो धूम-धाम से न मनाया जाता हो। ऐसे में भोले नाथ के प्रिय और स्तुत्य भगवान श्री राम की लीला न हो ऐसा कैसे हो सकता है। काशी में राम लीला का बहुत पुराना इतिहास है। बताते हैं कि 18वीं सदी में तत्कालीन काशिराज उदित नारायण सिंह ने रामनगर की रामलीला की शुरूआत की थी। तब से अब तक यह परंपरा बदस्तूर जारी है। हर साल भाद्रपद (भादो) शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी यानी अनंत चतुर्दशी को रामनगर की रामलीला का शुभारंभ होता है। इस बार अनंत चतुर्दशी गुरुवार 12 सितंबर को पड़ रही है। उसी दिन यह लीला शुरू होगी।

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बताते हैं कि 1783 में तत्कालीन काशी नरेश उदित नारायण सिंह ने रामनगर में रामलीला की शुरूआत की थी। तब से आज तक यह लीला उसी अंदाज में होती चली आ रही है। लीला का पूरा मंचन तुलसीकृत रामचरितमानस के आधार पर अवधी भाषा में होता है। खास बात यह कि तुलसीकृत मानस के हर प्रसंग की हर चौपाई और दोहे का विशेष अंदाज में सस्वर गान होता है। इसके लिए खास गायक होते हैं। इस 233 साल पुरानी इस रामलीला को देखने हजारों की भीड़ जुटती है। दर्शक भी खास अंदाज में होते हैं। सिर पर साफा धारण किए, लक-दक धोती कुर्ता में नजर आएंगे तकरीबन हर दर्शक। इस लीला को लेकर आईआईटी बीएचयू ने एक डाक्यूमेंट्री भी बनाई है।

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खास यह कि इस लीला का कोई एक निश्चित स्थान नहीं है, रामनगर में अलग-अलग मौकों के लिए अलग-अलग मंच व लीला स्थल हैं और वहीं यह लीला होती है। इन मंचों को अयोध्या, जनकपुर, चित्रकूट, पंचवटी, लंका और रामबाग का रूप दिया जाता है। इस लीला में बिजली-बत्ती, झालर आदि का इस्तेमाल नहीं होता बल्कि इस आधुनिक काल में भी लालटेन, पेट्रोमैक्स और मशाल की रोशनी में ही यह लीला मंचित होती है। लाउडस्पीकर तक का इस्तेमाल नहीं होता।

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परंपरागत रूप से राजपरिवार के प्रतिनिधि कुंवर अनंत नारायण राजसी अंदाज में हाथी पर सवार हो कर आएंगे। कुंवर के आते ही लीला स्थल पर पहले से मौजूद दर्शक परंपरागत रूप से हर-हर महादेव के उद्धोष संग उनका स्वागत करेंगे। उसके बाद ही रामलीला शुरू होती है। एक हाथ में पीढ़ा और दूसरे में रामचरितमानस की किताब लेकर यहां हर साल हज़ारों लोग रामलीला देखने आते हैं। पीढ़ा बैठने के लिए तो रामचरितमानस, लीला के दौरान पढ़ते रहने के लिए। एक तरफ लोग रामचरितमानस की चौपाइयां पढ़ते रहते हैं और दूसरी तरफ रामलीला संवाद के साथ आगे बढ़ती रहती है।

वैसे तो इस ऐतिहासिक लीला का शुभारंभ भादप्रद की कृष्णपक्ष चतुर्थी (2 सितंबर) से द्वितीय गणेश पूजन के साथ हो चुका है। तब रामलीला की सकुशल समाप्ति के लिए हुए गणेश पूजन में पांचों पात्र राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुध्न और सीता की पूजा की गई थी। साथ ही रामायण की पोथी, हनुमान जी का मुखौटा, गणेश जी की मूर्ति का पूजन किया गया था। झाल-मंजीरा और मृदंग की थाप गूंजी थी और रामायणी दल ने 'गाइये गणपति जग वंदन...' के साथ मानस के प्रसंगों में पगे दोहों का गायन शुरू कर दिया था। इसमें पहले दिन श्रीगणेश के तौर पर सात दोहों को स्वर दिए। अब अनंत चतुर्दशी के एक दिन पहले तक 175 दोहों का पाठ किया जाएगा। इनमें वह प्रसंग होंगे जिनका रामलीला मंच पर मंचन नहीं किया जाता है। मान्यता है कि पहले दिन यानी अनंत चतुर्दशी को रामबाग में रावण जन्म की लीला के साथ शुरू होगी यह लीला। मान्यताओं के अनुसार इस लीला का साक्षी बनने के लिए देवलोक से देवता भी उतरते हैं धरती पर। ऐसे में गुरुवार की शाम को रामनगर के रामबाग में देवलोक सा दृश्य प्रतिबिंबित होगा।

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