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स्वतंत्रता संग्राम की पहली वीरांगना थी काशी की ये बेटी, बिगुल फूंक कर दिए थे अंग्रेजों के दांत खट्टे

काशी के अस्सी भदैनी में था रानी लक्ष्मी बाई का ननिहाल

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Rani Laxmibai

Rani Laxmibai

वाराणसी. देश के स्वतन्त्रता संग्राम में महिलाओं ने भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आजादी की जंग लड़ी और युद्ध भूमि में साहस के साथ शत्रुओं से लोहा लेकर उन्हें परास्त करने वाली वीर योद्धा महारानी लक्ष्मी बाई की आज 183वीं जयंती है। जिसे पूरा देश हर्षोल्लास के साथ मना रहा है। रानी लक्ष्मी बाई की जन्मभूमि काशी है । काशी की बेटी और झांसी की रानी लक्ष्मी बाई ने भी 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल फूंक दिया था और उनके दांत खट्टे कर दिए थे। कभी मनु के नाम से बनारस की गलियों में खेलती रानी जो एक दिन मर्दानी बन देश के लिए अपना बलिदान दे दिया था।


काशी के अस्सी भदैनी में था रानी लक्ष्मी बाई का ननिहाल
बनारस के पुराने क्षेत्र अस्सी भदैनी उनका ननिहाल था। मनु का जन्म 19 नवंबर, 1835 को बनारस के एक मराठी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। जहां उन्हें मणिकर्णिका नाम दिया गया और घर में मनु कहकर बुलाया गया। उस समय मोरोपंत तांबे एवं भगीरथ चिम्पाजी अप्पा के सेवा में थे। चिम्पाजी अप्पा के मृत्यु के बाद मोरोपंत तांबे मन्नू के चार वर्ष की उम्र में विठूर के बालाजी राव पेशवा के यहां चले गए। कालांतर में झांसी के राज पुरोहित ने मन्नू से प्रभावित होकर झांसी के राजा गंगाधर राव से विवाह करा दिया। मात्र 22 साल 7 माह की छोटी उम्र में अपनी कर्तव्य निष्ठा, वीरता के अनुपम काम के लिए झांसी की रानी लक्ष्मी बाई इतिहास के पन्नों पर अमर हो गई।


काशी में स्थित है रानी लक्ष्मी बाई की प्रतिमा
वीरांगना लक्ष्मी बाई का जन्म जिस स्थान पर हुआ था आज भी वह स्थान काशी में स्थित है। वहां मनु की एक बड़ी सी प्रतिमा है जो वीर मुद्रा में स्थापित है। प्रतिवर्ष यहां उनकी जयंती पूरे धूमधाम से मनाई जाती है । लक्ष्मी बाई का जन्म बनारस में हुआ था और उनका योगदान पूरे देश के लिए प्रेरणादायक और गौरव की बात है। ऐसे में विभिन्न संस्थाएं और स्कूले अपने तरीके से वीरांगना की जयंती मनाते हैं।