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एक देश एक कर तो एक शिक्षा प्रणाली क्यों नहीं, PM के क्षेत्र में चला हस्ताक्षर अभियान

न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल का फैसला लागू करने की मांग, राज्य स्तर पर अभियान चलाने की घोषणा, जल्द ही बुलायी जायेगी राज्यस्तरीय बैठक।

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Ajay Chaturvedi

Jul 14, 2017

Signature campaign

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वाराणसी.
एक देश एक कर तो एक देश एक शिक्षा प्रणाली क्यों नहीं। यह सवाल पूछा है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र के युवाओं ने। उन्होंने इसके लिए हस्ताक्षर अभियान चलाया शुक्रवार को।








उन्होंने प्रदेश के परिषदीय विद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के दृष्टिगत उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल के 18 अगस्त 2015 को दिए ऐतिहासिक फैसले के अनुपालन के साथ प्रदेश की शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन के लिए सकारात्मक कदम उठाने के लिए सरकार पर जनदबाव बनाने की खातिर शिक्षा का अधिकार अभियान, ज्वाइंट एक्शन कमेटी, साझा संस्कृति मंच आदि द्वारा संयुक्त रूप हस्ताक्षर अभियान चलाया गया। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के गेट संख्या एक पर दोपहर 12 बजे से 1 बजे तक चले इस हस्ताक्षर अभियान के तहत यह घोषणा की गई कि सामान शिक्षा के लिए पूरे देश में विभिन्न संगठनों के साथ साझा कार्यक्रम संचालित किए जाएंगे।









हस्ताक्षर अभियान के माध्यम से सरकार से मांग की गई कि माननीय उच्च न्यालय के 18 अगस्त 2015 के आदेश का अनुपालन प्रदेश में सुनिश्चित कराया जाय, प्रदेश में शिक्षा का बजट बढाया जाय,. परिषदीय स्कूलों में उच्च स्तर के संसाधन उपलब्ध कराए जाएं तथा सभी के लिए समान शिक्षा की नीति व्यवहारिक रूप से लागू की जाए।

बता दें कि मेगसायसाय सम्मानित वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता डॉ संदीप पाण्डेय ने भी इस संबंध में लखनऊ में विगत सप्ताह तीसरी बार आठ दिन तक अनशन करके सरकार को चैतन्य करने की कोशिश की है।


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इस मामले में वर्तमान सरकार द्वारा बरती जाने वाली लापरवाही को आड़े हाथों लेते हुए वक्ताओं ने कहा कि वर्तमान राज्य सरकार इस मामले में अपनी पूर्ववर्ती सरकार के पद चिन्हों पर चल रही है। इस अवसर पर वक्ताओं ने परिषदीय विद्यालयों मे शिक्षा की गुणवत्ता के संबंध में इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश, जिसमे कोर्ट ने सभी नौकरशाहों और सरकारी कर्मचारियों के लिए उनके बच्चों को सरकारी प्राथमिक विद्यालय में पढ़वाना अनिवार्य करने का निर्देश राज्य सरकार को दिया गया था को ऐतिहासिक और क्रांतिकारी फैसला बताते हुए कहा कि इस फैसले से परिषदीय स्कूलों में शिक्षा के स्तर में सुधार की चर्चा समाज के हर स्तर पर प्रारंभ हुई थी।


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लेकिन इसे सार्थक और व्यावहारिक स्तर तक ले जाने के लिए पूर्ववर्ती सरकार की ही तरह वर्तमान सरकार भी कोई इच्छा शक्ति नही दिखा रही है। उन्होंने कहा कि यह हताक्षर अभियान बच्चों को उनके अधिकार दिलाने के समर्थन में है क्योंकि परिषदीय प्राथमिक और पूर्व माध्यमिक विद्यालयों में पढने वाले बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पाने का पूरा अधिकार है।


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हस्ताक्षर अभियान में शामिल नागरिकों का मानना है कि सरकार यदि वास्तव में अपने विद्यालयों की खोई हुई गरिमा वापस लौटाना चाहती है तो सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों, जन प्रतिनिधियों व न्यायाधीशों के बच्चे सरकारी विद्यालय में पढ़ने के लिए सरकारी विद्यालयों में भेजना अनिवार्य करना ही होगा।











सभी का मानना है कि इनके जाते ही सरकारी विद्यालयों की गुणवत्ता में रातों-रात सुधार होगा जिसका फायदा गरीब जनता को मिलगा जिसका बच्चा भी अच्छी शिक्षा पाएगा। इसका लाभ उन मध्यम वर्गीय परिवारों को भी मिलेगा जो अभी अपने बच्चों को मनमाना शुल्क वसूल करने वाले विद्यालयों में भेजने के लिए मजबूर हैं क्योंकि तब ये लोग भी अपने बच्चों को सरकारी विद्यालयों में ही पढ़ाएंगे।









हस्ताक्षर अभियान में आनंद प्रकाश तिवारी, सानिया अनवर, ओम प्रकाश, आशुतोश, प्रेम प्रकाश, महिमा, रणविजय, दीनदयाल, प्रियंका, श्वेता, श्रद्धा, एकता, सूरज, नीलम पटेल, दीपक पुजारी समेत सैकड़ों नागरिकों ने हिस्सा लिया।





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