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लोकसभा चुनाव 2019- यूपी में सपा-बसपा-कांग्रेस गठबंधन तीनो की मजबूरी

अपर हैंड में सपा, पार्टी नेतृत्व को पूरा भरोसा मिल कर ही लड़ेंगे चुनाव।

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अखिलेश मायावती और राहुल गांधी

अखिलेश मायावती और राहुल गांधी

वाराणसी. मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ, पश्चिम बंगाल सहित पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बाद सियासत की धुरि तेजी से अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव की ओर मुड़ेगी। इस चुनाव को लेकर सभी राजनीतिक दलों के बीच रस्साकसी तेज है। लोकसभा चुनाव की तैयारी की दृष्टि से फिलहाल बीजेपी सबसे आगे है। उधर बीजेपी को हराने के लिए बनने वाले महागठबंधन को लेकर सहयोगी दलों के नेताओं या कहें कि बसपा सुप्रीमों मायावती के बयान से हलचल जरूर है। मायावती ने जिस तरह से कांग्रेस को नकारा है उससे कम से कम यूपी में महागठबंधन को लेकर संशय की स्थिति जरूर बनी है। लेकिन राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यूपी में भी महागठबंधन एक हो कर ही चुनाव लड़ेगा। इस बात को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भलीभांति समझ लिया है। तभी वो बार-बार यही कह रहे हैं कि चुनाव आते-आते सब कुछ ठीक हो जाएगा। उधर अखिलेश यादव को भी पूरा विश्वास है कि गठबंधन होगा। दरअसल 2019 में अगर बीजेपी को मात देना है तो सपा, बसपा और कांग्रेस को एक होना ही पड़ेगा। ये तीनों की मजबूरी है। खास तौर पर कांग्रेस और बसपा के लिए। कारण दोनों ही पार्टियां फिलहाल यूपी की सियासत के हाशिये पर है। राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि गठबंधन से जो भी दूर होगा उसके वजूद का संकट खड़ा हो सकता है।

जहां तक बसपा और मायवती का सवाल है तो राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि मायवती भले ही कुछ भी कहें लेकिन महागंठबंधन में शामिल हो कर ही उनका मंसूबा पूरा हो सकता है। विश्लेषक कहते हैं कि 2014 और 2017 के विधानसभा चुनाव परिणामों पर गौर फरमाएं तो यूपी में ही बसपा और मायावती की वो स्थिति नहीं जो 2007 में थी, जब उन्होंने प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाई थी। पांच साल बाद ही वह सत्ता से न केवल बाहर हुईं बल्कि युवा अखिलेश यादव ने सूबे की सियासत पर अच्छी पकड़ बना ली। फिलहाल सूबे में बसपा और कांग्रेस की तुलना में अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली समाजवादी पार्टी की स्थिति कहीं बेहतर है। सपा नेता भी मान कर चल रहे हैं कि देर सबेर यूपी में बीजेपी को हराने के लिए महागठबंधन होगा ही।

राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि 2014 लोकसभा और 2017 विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी का लगभग सफाया हो गया, जिस बीएसपी ने 2007 में प्रचंड बहुमत हासिल किया था उसी पार्टी को 7 साल बाद उत्तर प्रदेश में एक भी लोकसभा सीट नहीं मिली और उससे भी शर्मनाक यह कि प्रदेश के 403 विधानसभा क्षेत्र में से बसपा को महज 09 क्षेत्र में बढ़त मिली थी। उस चुनाव में बीएसपी से कहीं आगे कांग्रेस रही जिसे राज्य के 15 विधानसभा क्षेत्र में बढ़त मिली। यह बसपा और मायावती के लिए बड़ा झटका रहा।

लोकसभा के बाद 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में भी हालात बहुत खास नहीं बदले। विधानसभा चुनाव में बीएसपी ने 05 प्रतिशत की दर से 19 सीटें जीतीं। वही कांग्रेस का 06 फीसदी और समाजवादी पार्टी का जीत का स्ट्राइक रेट 15 फीसदी रहा। दो बड़े चुनावों में ऐतिहासिक झटके को अपवाद नहीं माना जा सकता। हालांकि 2012 के विधानसभा चुनाव की बात करें तो बीएसपी को गैर जाटव दलितों का 48 प्रतिशत वोट बीएसपी को मिला था। लेकिन उसके बाद से बीएसपी का वोट शेयर हर चुनाव में लगातार गिर रहा है।

2017 विधानसभा चुनाव में सपा, बसपा और कांग्रेस की स्थिति
दल- सीटों पर चुनाव लड़े- जीत का औसत
सपा- 311-15 प्रतिशत
कांग्रेस-114-06 प्रतिशत
बसपा-403-05 प्रतिशत

ऐसे में राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि मौजूदा परिस्थितियों में मायावती को सहयोगियों की जरूरत है, जो उनके मैसेज को समाज के दूसरे वर्गों में पहुंचाएं। ज्यादा सीटें पाने के लिए जोड़-तोड़ जरूरी है। बातों, बयानों में किसी दल को झटका देना भी लाजमी है लेकिन हर हाल में मायावती अब ग्रैंड एलाएंस से खुद को अलग नहीं कर सकतीं, 2019 का लोकसभा चुनाव इसका टेस्ट होगा।

संगठनात्मक तौर पर जिला स्तर पर सपा पूरी तरह से तैयार

इस बीच समाजवादी पार्टी स्थानीय स्तर पर पूरी मुस्तैदी के साथ अपनी सियासी बिसात बिछाने में जुटी है। वाराणसी के जिलाध्यक्ष डॉ पीयूष यादव बताते हैं कि बूथ कमेटियों का गठन हो चुका है। इसकी सूची प्रदेश नेतृत्व को महीना भर पहले ही भेजी जा चुकी है। विधानसभा से लेकर बूथ स्तर तक कार्यकर्ता सम्मेलन भी काफी हद तक सफल रहे हैं अब तक। डॉ यादव ने कहा कि हम लोग अपने स्तर से जुटे हैं। गठबंधन का फैसला तो शीर्ष नेतृत्व को करना है। नेतृत्व जो कहेगा वो किया जाएगा। फिलहाल हम अकेलेदम पर भी चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं।


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