
कालिया दाह के बाद दर्शन देते श्री कृष्ण
वाराणसी. काशी के लक्खा मेलों में शुमार तुलसीघाट की नाग नत्थैया लीला रविवार को हर्षोल्लास से संपन्न हुई। इस लीला को देखने के लिए दूर दराज से आए लाखों श्रद्धालु। काशी की उत्तर वाहिनी गंगा ने आज यमुना का स्वरूप धरा तो शिव की नगरी में श्री कृष्ण ने अवतार लिया। लेकिन जैसे ही श्री कृष्ण कालिया दाह के लिए नदी में कूदे श्रद्धालुओं की सासें थम गईं। जब तक वह कालिया दाह कर बंशी बजाते मुस्कुराते बाहर नहीं निकल आए लोगों की धड़कनें बढ़ी हुई थीं। लेकिन जल के ऊपर आते ही पूरा वातावरण श्री कृष्ण के जयकारों से गूंज उठा।
लगा ऐसा मानों प्रदूषण रूपी फुंफकारों से यमुना के प्रवाह और गोकुल-वृंदावन की आबो हवा में जहर घोल रहे कालीय नाग का दर्प भंग कर पर्या वरण पुरूष भगवान श्रीकृष्ण ने आज फिर एक बार प्रकृति के संरक्षण का संदेश दिया हो। तकरीबन साढे चार सौ साल पहले गोस्वामीतुलसीदास जी द्वारा शुरू की गई श्रीकृष्ण लीला की इस परंपरागत झांकी का दर्शन करने के लिए मानो पूरी काशी ही नहीं वरन् समूचा पूर्वांचल तुलसीघाट पर उमड़ आा हो।
परंपरागत रूप से कालिया दाह की इस कृष्ण लीला के साक्षी बने पूर्व काशिराज परिवार के वंशज कुंवर अनंत नारायण। काशी के लक्खा मेलों में शुमार नाग नथैया की लीला बीते करीब साढ़े चार सौ सालों की अनमोल थाती है। अस्सीघाट से लेकर निषादराज घाट तक गंगा की गोद में भीड़ से पटी नौकाएं और बजड़े इस बात के गवाह बने। दुनिया में अपने आप में अनूठी पांच मिनट की इस लीला के दर्शन को उमड़ा जनसैलाब उन सैकड़ों विदेशी मेहमानों के लिए एक चमत्कार सरीखा था। जो स्वयं ही लीला की भावपूर्ण झांकी देखकर अभिभूत थें। इटली के मार्टिना ने माना कि इस तरह के आयोजन प्रदूषण के खिलाफ जनजागरण का सशक्त माध्यम साबित हो सकते है। जर्मनी के पॉल बाउटों इस बात को लेकर देर तक उधेड़बुन में फंसे रहे कि कथा और भाषा दोनों से अनभिज्ञ होने के बावजूद इस झांकी से उनके रोम रोम क्यों पुलकित हो उठे।
इस चमत्कारी लीला के दर्शन के लिए तुलसीघाट पर दोपहर बाद से ही भीड़ जुटने लगी थी। गोधूलि बेला से ठीक पहले 04. 40 बजे कुंवर अनंत नारायण सिंह का काफिला तुलसी घाट के सामने रुका तो समूचा लीला क्षेत्र ‘हर हर महादेव’ के उद्घोष से गूंज उठा। इधर घाट के चौड़े पथरीले प्रस्तर सोपानों पर भगवान श्रीकृष्ण, सुदामा और अन्य मित्रों के बीच कंदुक क्रीड़ा में मग्न थे। खेल-खेल में ही गेंद यमुना रूपी गंगा में जा गिरी। मित्रों ने उलाहने के साथ भगवान श्रीकृष्ण को वह गेंद वापस लाने को कहा और घड़ी की सुइयों के 04.45 पर पहुंचते ही श्री कृष्ण रूप धरे पात्र उफनते कालीय दह मे कूद पड़े। जैसे ही श्री कृष्ण ने यमुना में छलांग लगाई लगा लोगों की धडकने थम सी गई हों। भीड़ में सन्नाटा सा पसर गया। लेकिन कुछ ही पल बाद कालीय का फन नाथकर नृत्य मुद्रा में वंशी बजाते भगवान श्रीकृष्ण की दिव्य झांकी देख भक्तों ने ऐसा जयकारा लगाया कि जमीन से आसमान तक गूंज उठा।
सम्पूर्ण लीला क्षेत्र वृंदावन बिहारी लाल की जयकारों से गुंजरित हो उठा था। लोगों ने आरती उतारी। ऐसे में घाट से लेकर गंगा उस पार तक हर दिशा में इस आरती ने माहौल को दिव्यता प्रदान कर दी। लोग हाथ जोड़े इस झांकी को अपने अंतःकी गहराइयों तक उतार रहे थे। ढलती शाम योगेश्वर कृष्ण की वंदना के गीत गा रही थी। परंपरा के अनुसार काशी नरेश ने स्वयं आगे बढ़कर भगवान कृष्ण को माल्यार्पण किया उधर अखाड़ा गोस्वामी तुलसीदास के महंत प्रो. विशम्भरनाथ नाथ मिश्र ने समस्त काशीवासियों की ओर से कुंवर अनंत नारायण सिंह को सम्मान पुष्प अर्पित किया।
जन-जन बने योगेश्वर कृष्ण
इस अवसर पर काशीवासियों को उदबोधन देते हुये अखाड़ा गोस्वामी तुलसीदास के महंत प्रो. विशम्भरनाथ मिश्र ने कहा कि आज जरूरत है कि जन-जन भगवान श्रीकृष्ण की भूमिका निभाए और जिस तरह उन्होनें कालीय दह कर प्रदूषण मुक्त किया उसी तरह गंगा के उद्धार को कदम आगे बढ़ाएं। उन्होने कहा कि जनभागीदारी अपनी जगह लेकिन सरकारें भी अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ नही सकती क्योंकि व्यवस्था की पूरी कमान उनके ही हाथों में है।
Published on:
11 Nov 2018 09:30 pm
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