वाराणसी. लोकनायक जयप्रकाश की 115 वीं जयंती पर बुधवार को आयोजित हुआ कार्यकर्म ‘संवदिया’। इस छात्र-युवा सम्मेलन में काशी हिंदू विश्वविद्याय के छात्र-छात्राओं संग जुटे पूर्व छात्र नेता, राजनीतिक दलों के पदाधिकारियों ने भी सहभाग किया। तीन घंटे से भी अधिक समय तक चले इस आयोजन में सभी ने एक स्वर से कहा न नूटेंगे, न झुकेंगे, लड़ेंगे और लड़ेंगे। सरकार की प्रतिरोध की आवाज को बंद करने की साजिश को हर हाल में कामयाब नहीं होने देंगे। संस्थागत हमलों को नहीं सहेंगे, लैंगिक असमानता को दूर करके रहेंगे। इस मौके पर जहां बीएचयू की छात्राओं और छात्रों ने जहां पिछले तीन साल की आपबीती सुनाई और कहा कि 21 से 23 सितंबर तक का आंदोलन स्वतः स्फूर्त नहीं था वह महज 21 सितंबर की शाम छात्रा के साथ हुई छेड़खानी का विरोध नहीं था। बल्कि वह तीन साल से इस विश्वविद्याल्य में सुलग रहे वैचारिक ज्वालामुखी का फटना था।
इस मौके पर गांधीवादी विचारक हिमांशु कुमार ने कहा कि आज विपक्ष की भूमिका में तो छात्र-छात्राएं हैं और सरकार ने इसी वजह से अपनी पूरी ताकत छात्र-छात्राओं की आवाज को दबाने में लगा दी है। उन्होंने सवाल किया कि ये सरकार आखिर चाहती क्या है? छात्र किस राह पर जाना चाहते हैं और सरकार उन्हें किस राह पर ले जाना चाहती है। कहा कि दरअसल आज मौज उनकी है जो आराम से बैठने वाले हैं, जबकि समाज की नींव तो अन्याय के खिलाफ लड़ने से रखी जाती है। उन्होंने केंद्र की भाजपा नेतृत्व वाली सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान आजादी के दीवानों ने जो संकल्पना की थी उसे पूरी तरह से ध्वस्त करने की सोच रखी थी कुछ ऐसी शक्तियों ने जिनका आजादी के आंदोलन से कोई सरोकार ही नहीं रहा। इसी के तहत आजादी के तुरंत बाद पहले गांधी की हत्या की गई। 1947 में ही अयोध्या में राम की प्रतिमा रखवा दी। वे अब केंद्रीय सत्ता पर काबिज हो गए। उन्होंने बराबरी की सोच की ध्वस्त कर दिया।
बीएचयू के पूर्व छात्र नेता, डॉ राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण के शिष्य सपा एमएलसी शतरुद्र प्रकास ने कहा कि डॉ लोहिया इस बीएचयू से जुड़े रहे। उन्होंने यहीं सेंट्रल हिंदू कॉलेज से शिक्षा ग्रहण की। जयप्रकाश नारायण ने भी यहां दाखिला लिया। डॉ लोहिया ने जब 1960 के दशक में अंग्रेजी हटाओ आंदोलन शुरू किया तब इस बीएचयू ने बड़ चढ़ कर हिस्सा लिया। बीएचयू के छात्र-छात्राओं ने उस आंदोलन को न केवल पूर्वांचल बल्कि समूचे उत्तर भारत में फैला दिया। बीएचयू का छात्र आंदोलन का इतिहास रहा है। वह दौर भी था जब बतौर कुलपति महामना मदन मोहन मालवीय जेल गए। उन्होंने छात्र-छात्राओं को ललकारते हुए कहा, हमारे जमाने में लोहिया, जयप्रकाश, राजनारायण सरीखे मार्ग दर्शक थे, लेकिन आज आपके लिए कोई नहीं, ऐसे में आप को ही लोहिया, जयप्रकाश और राजनारायण बनना होगा। आपको ही अपनी लड़ाई को मुकाम तक पहुंचाना होगा। उन्होंने विश्वविद्यलाय छात्रसंघ की पहली महिला उपाध्यक्ष अंजना प्रकाश का जिक्र करते हुए कहा कि उस दौर में जब अंग्रेजी हटाओ आंदोलन चल रहा था तब उन्हें भी पुलिस के बर्बर लाठीचार्ज का कोपभाजन बनना पड़ा था, लेकिन तब हम लोग लोहिया जी के साथ लखनऊ जेल में थे। लेकिन तब की पुलिस और आज की पुलिस में इतना अंतर था कि तब जिस पुलिस अधिकारी ने लाठी चलाई थी उसने अंजना प्रकाश से माफी मांगी। घटना के लिए खेद जताया।
इस मौके पर अपना दल की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पल्लवी पटेल, सपा नेता पंखुड़ी पाठक, कांग्रेस नेता श्वेता राय, एयर 4 केयर व ज्वाइंट एक्शन कमेटी की एकता शेखर, विकास सिंह, सुजाता राठौर, शैला, बीएचयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष शिवकुमार सिंह, आम आदमी पार्टी के पूर्वांचल संयोजक संजीव सिंह आदि ने संवदिया कार्यक्रम में जुटे छात्र-छात्राओं की जम कर हौसला अफजाई की। विकास सिंह ने कहा कि यह आंदोलन एक दो दिन का नहीं बल्कि एक दशक से इस विश्वविद्यालय में दबी कुचली गई आवाज का नतीजा था। एक ऐसा विश्वविद्यलाय जहां पढ़ने की आजादी नहीं, उल्टे 24 घंटे लाइब्रेरी की जो सुविधा दी जाती रही उसे बंद कर दिया गया। छात्राओं के लिए रात में कैंपस बस सर्विस की मांग को खारिज कर दिया गया। छात्राओं पर तमाम तरह की बंदिशें लगाई गईं। कुलपति कहते हैं कि छात्राएं शाम ढलने के बाद छात्रावास से निकल नहीं सकतीं। ऐसे में वर्षों से छात्र-छात्राओं की जो ज़ुबान पर जो ताला लगाया जाता रहा, उनका जिस तरह से मानसिक शोषण किया जाता रहा वह एक दिन फूटना ही था, यह तो बहुत पहले हो जाना चाहिए था लेकिन वह वक्त तब आया जब कुलपति के कार्यकाल के महज दो महीने रह गए थे। महिला महाविद्याय की छात्राओं ने भी अपनी आपबीती सुनाई, कहा कि हम क्या करेंगे, क्या खाएंगे, क्या पहनेंगे, किससे मिलेंगे यह तय करने का काम कोई दूसरा कैसे कर सकता है। ये वीसी कहते रहे कि तुम्हारे पिता ने दी थी इतनी आजादी, अरे मेरे पिता ने इतनी आजादी न दी होती तो हमें यहां छात्रावास में रह कर पढ़ने क्यों भेजते। आप मेरे पिता हो, अरे आपका जो दायित्व था वह तो निभाते। एक तरफ कहते रहे कि आठ बजे के बाद बाहर नहीं निकलना है और हमें पूरी रात चौराहे पर धरना देने के लिए अकेले छोड़ दिया। ऊपर से हम निहत्थों पर पुलिस व प्रॉक्टोरियल बोर्ड के सदस्यों से लाठियों से पिटवाया। क्या इस लिए हमारे माता-पिता ने हमें यहां भेजा था। आज भी हमारे घरों में फोन किए जा रहे हैं। अभिभावकों पर दबाव बनाया जा रहा है कि हम शांत रहें। लेकिन अब ये नहीं होने वाला।