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जानिये कौन हैं तुलसी और Hari Prabodhini Ekadashi पर क्यों करते हैं तुलसी की पूजा और विष्णु संग विवाह

भगवान विष्णु का मिला आशीर्वाद तो पूजित हुईं तुलसी।

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तुलसी और भगवान विष्णु

तुलसी और भगवान विष्णु

वाराणसी. सनातन हिंदू धर्म में तुलसी का महत्वपूर्ण स्थान है। तुलसी पूजित हैं। भगवान को लगने वाले भोग में तुलसी दल डाला जाता है। लेकिन ऐसा क्या है कि तुलसी को इतनी महत्ता मिली। कौन हैं तुलसी, किस कारण इतनी महत्ता मिली। हरि प्रबोधनी एकादशी को जब भगवान विष्णु योग निद्रा से जागते हैं तो क्यों तुलसी की पूजा की जाती है। क्यों उनका विवाह किया जाता है। इसकी एक लंबी कहानी है जो धर्म ग्रंथों में वर्णित है।

काशी के जानेमाने ज्योतिषाचार्य पंडित बृज भूषण दुबे ने बताया कि तुलसी (पौधा) पूर्व जन्म मे एक लड़की थी जिस का नाम वृंदा था। राक्षस कुल में उसका जन्म हुआ था। बचपन से ही भगवान विष्णु की भक्त थी। बड़े ही प्रेम से भगवान की सेवा, पूजा किया करती थी। वह जब बड़ी हुई तो उनका विवाह राक्षस कुल में दानव राज जलंधर से हो गया। जलंधर समुद्र से उत्पन्न हुआ था। वृंदा बड़ी ही पतिव्रता स्त्री थी सदा अपने पति की सेवा किया करती थी। एक बार देवताओ और दानवों में युद्ध हुआ। जलंधर जब युद्ध पर जाने लगे तो वृंदा ने कहा, स्वामी आप युद्ध पर जा रहे है, आप जब तक युद्ध में रहेगे मैं पूजा में बैठ कर आपकी जीत के लिए अनुष्ठान करुगी और जब तक आप वापस नहीं आ जाते, मैं अपना संकल्प नही छोडूंगी।

जलंधर तो युद्ध में चले गए और वृंदा व्रत का संकल्प लेकर पूजा में बैठ गईं। उनके व्रत के प्रभाव से देवता भी जलंधर को न जीत सके। ऐसे में सारे देवता जब हारने लगे तो विष्णु जी के पास गए। सबने भगवान से प्रार्थना की तो भगवान कहने लगे कि, वृंदा मेरी परम भक्त है में उसके साथ छल नहीं कर सकता। इस पर देवता बोले, भगवान दूसरा कोई उपाय भी तो नहीं है, अब आप ही हमारी मदद कर सकते है।

इस पर भगवान ने जलंधर का ही रूप रखा और वृंदा के महल में पहुंच गए। वृंदा ने जैसे ही अपने पति को देखा, वह तुरंत पूजा से उठ गई और उनके चरणों को छू लिए। लेकिन जैसे ही वृंदा का संकल्प टूटा, युद्ध में देवताओ ने जलंधर को मार दिया और उसका सिर काट कर अलग कर दिया। जलंधर का सिर वृंदा के महल में गिरा। वृंदा ने जब देखा कि मेरे पति का सिर तो कटा पडा है तो फिर ये जो मेरे सामने खड़े है ये कौन है?

वृंदा ने पूछा, आप कौन हो जिसका स्पर्श मैने किया, तब भगवान अपने रूप में आ गए पर वे कुछ ना बोल सके। वृंदा सारी बात समझ गई। उन्होंने भगवान को श्राप दे दिया कि आप पत्थर के हो जाओ और भगवान तुंरत पत्थर के हो गए। सभी देवता हाहाकार करने लगे लक्ष्मी जी रोने लगीं और प्रार्थना करने लगीं तब वृंदा जी ने भगवान को वापस वैसा ही कर दिया और अपने पति का सिर लेकर वह सती हो गईं।

उनकी राख से एक पौधा निकला तब भगवान विष्णु जी ने कहा, आज से इनका नाम तुलसी है और मेरा एक रूप इस पत्थर के रूप में रहेगा, जिसे शालिग्राम के नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जाएगा और मैं बिना तुलसी जी के भोग स्वीकार नहीं करूंगा। तब से तुलसी जी कि पूजा सभी करने लगे और तुलसी जी का विवाह शालिग्राम जी के साथ कार्तिक मास में किया जाता है। देव-उठावनी एकादशी के दिन इसे तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है।

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