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Azadi ka Amrit Mahotsav: स्वतंत्रता दिवस 1947 की वो रात जब पूरा शहर निकल पड़ा था सड़कों पर

Azadi ka Amrit Mahotsav: आजादी की वो रात काशी का बच्चा, बच्चा सड़कों पर निकल आया। पहले तो किसी को सहज विश्वास नहीं हुआ पर जब तस्दीक हुई तो फिर हाथ में तिरंगा लिए, भारत माता के जयकारे लगाते, वंदे मातरम का उद्घोष करते निकल पड़े। जिस घर में जो भी मीठा था उसी से एक दूसरे का मुंह मीठा कराया। ये सिलसिला करीब हफ्तों तक जारी रहा।

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स्वतंत्रता दिवस 1947 की रात (फाइल फोटो)

स्वतंत्रता दिवस 1947 की रात (फाइल फोटो)

वाराणसी. Azadi ka Amrit Mahotsav: 14 अगस्त 1947 को आधी रात को जब देश आजाद हुआ तो उसकी खबर पलक झपकते ही पूरे देश में जंगल की आग की तरह फैल गई। ऐसे में काशी भला उससे कैसे अछूता रहता। काशी में जैसे ही देश की आजादी की खबर आई तो पहले लोगों को विश्वास नहीं हुआ। लोग ये हकीकत जानने के लिए सड़कों पर उतर आए। समीप के पुलिस थानों पर पहुंचे जहां से उन्होंने पूर्ण तस्दीक हुआ कि अब उनके आंदोलन का परिणाम मिल गया है। देशवासी अब किसी के गुलाम नहीं रहे। फिर क्या पूरी रात हाथों में तिरंगा लेकर सड़कों पर दीवानों की तरह दौड़ते रहे। रात में जिसके घर में जो भी मीठा था उसी का वितरण किया गया। ये सिलसिला महीने भर तक जारी रहा।

जब लोगों को सहज विश्वास नहीं हुआ

वाराणसी के खोजवां निवासी वृद्ध भरत लाल बताते हैं, तब 'मेरी उम्र तब महज छह साल थी, बड़े पिता जी लल्लन प्रसाद गुप्ता उर्फ "मुनीम जी" स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। बड़े पिता जी गांधी जी के भारत छोड़ो आंदोलन के तहत जेल जाने की तैयारी में थे। उनके साथ खोजवां के कई लोग थे, तभी एक युवक दौड़ते हुए आया और जोर-जोर से चिल्लाने लगा कि देश आजाद हो गयल, देश आजाद हो गयल। बड़े पिता जी जो जेल जाने की तैयारी में थे, मुझे सीने से चिपकाए थे। उन्होंने उस युवक को बुलाया, उसकी बात की तस्दीक करने के लिए कुछ लोगों को भेलूपुर थाने भेजा गया। फिर वहां से लौट कर आए लोगों ने आजादी की तस्दीक की तो वहां जश्न मना, व्यापारियों ने पीतल और तांबे के गगरों (कलश) से वंदन द्वार बनाया। रात भर क्या, कई दिनों तक आजादी का जश्न मनाया जाता रहा।

तब खोजवां में बनाया गया गांधी चबूतरा

भरत लाल के पड़ोसी ओम प्रकाश गुप्ता बताते हैं कि 1942 में जहां महात्मा गांधी रुके थे, भाषण दिया था उस जगह चबूतरा बना गया और उसे गांधी चबूतरा नाम दिया गया। 1964 में उस चबूतरे को पक्का कर मंच का स्वरूप दे दिया गया। वहीं दीवार पर मशहूर चित्रकार भानू जी ने महात्मा गांधी और कस्तूरबा गांधी का चित्र बनवाया।

हर चेहरे पर संतुष्टि और उल्लास का भाव, उत्सव का यह दौर हफ्तों तक चला

आराजीलाइन क्षेत्र के डीहगंजारी गांव निवासी 102 वर्षीय सीताराम शास्त्री बताते हैं कि महज 14 साल की उम्र में स्वाधीनता की लड़ाई में कूद पड़े थे। तकरीबन 13 साल तक देश की आजादी की लड़ाई लड़े और उस बीच दो बार जेल भी गए। सीताराम शास्त्री ने कहा कि देश की आजादी के दिन बनारस का विहंगम दृश्य था। ऐसा लग रहा था कि मानो काशी के सारे लक्खा मेले (जिनमें एक लाख से ज्यादा लोगों की भीड़ उमड़ती हो) एक साथ शुरू हो गए हों। उस दिन गरीब से गरीब व्यक्ति ने भी दान किया था। हर चेहरे पर संतुष्टि और उल्लास का भाव दिख रहा था। उत्सव का यह दौर हफ्तों तक चला था।

गली-गली घूम कर क्रांतिकारियों और स्वतंत्रता सेनानियों का आभार जताया गया

पांडेय हवेली क्षेत्र के डॉ. तपन कुमार घोष कहते हैं कि देश की आजादी के दिन बनारस के संगीत घरानों की चांदी हो गई थी। गाने-बजाने वालों की कई टोलियां बनी थीं। टोलियों में गली-गली घूम कर क्रांतिकारियों और स्वतंत्रता सेनानियों का आभार जताया गया था। उन टोलियों पर एकन्नी-दुअन्नी, तीन पैसे और पांच पैसे के सिक्के लोग उछालते थे। कलाकारों ने इन पैसों से दोस्तों को पार्टियां दीं। पांडेय हवेली के रईस बंगालियों ने भी कई दिनों तक भंडारा कराया था।

कई दिनों तक चला था भंडारा

95 वर्षीय स्वतंत्रता सेनानी बालकृष्ण नागर ने बताया कि हम लोगों का आजादी का उत्सव 14 अगस्त 1947 से ही शुरू हो गया था। 15 अगस्त की सुबह से ही काशी में बसने वाले गुजराती समाज के लोगों और हीरे-जवाहरात के कारोबारियों ने जमकर खजाने लुटाए थे। देसी घी में बने भोजन का भंडारा कई दिनों तक चला था। भंडारे में आने वाले दंडी संन्यासियों और ब्राह्मणों को श्रद्धा भाव के साथ दक्षिणा दी गई थी। गरीबों में कपड़े बांटे गए थे। एक-एक व्यापारी ने कई-कई लोगों को दावतें कराई थी। हमने अपने अब तक के जीवन काल में जश्न का वैसा दौर फिर कभी नहीं देखा।