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जानिये कमरुद्दीन कैसे बन गए शहनाई के सम्राट उस्ताद बिस्मिल्लाह खान

16वीं पुण्यतिथि पर याद किये गए उस्ताद बिस्मिल्लाह खान। दरगाह-ए-फातमान स्थित उनके मकबरे पर पहुंचकर लोगों ने दी श्रद्धांजलि।

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वाराणसी. उस्ताद बिस्मिल्लाह खान, जिसने अपनी शहनाई के सुरों का पूरी दुनिया में लोहा मनवाया, लेकिन बनारस की सुबह पर अपना सबकुछ हार गए। गंगा घाट और मंदिरों में गूंजते घंटे घड़ियाल और उसी के साथ मिलकर बुलंद होती अजान की आवाज के साथ उनकी शहनाई से निकले सुर ऐसे घुल-मिल गए कि मानो दोनों एक दूसरे से कभी अलग रहे ही न हों। बिस्मिल्लाह और बनारस एक दूसरे का पर्याय हो गए। उस्ताद बिस्मिल्लाह खान (Ustad Bismillah Khan) को बनारस से इस कदर प्यार हो गया कि वो किसी कीमत पर बनारस छोड़ने को तैयार नहीं थे। उस्ताद की ये सब बातें उनकी 14वीं पुण्यतिथि पर याद की गयीं।

बनारसम में दरगाह-ए-फातमान स्थित उनके मकबरे पर बुधवार को उनके बेटे, नाती-पोते और खानदान के लोग जुटे और उस्ताद को याद करते हुए उनके लिये दुआ की और फातिहा पढ़ा गया। इस मौके पर एडीएम सिटी विनय कुमार और एसपी सिटी दिनेश कुमार सिंह, भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष हैदर अब्बास चांद और अब्बास मुर्तुजा शम्सी वगैरह ने उनकी मजार पर फूलों की चाद चढ़ाते हुए नजराना-ए-अकीदत पेश की।

उस्ताद के बेटे काजिम हुसैन, नाजिम हुसैन, रिश्तेदार उस्ताद फतेह अली, बड़ी बेटी जरीन फातिमा, पोता आफाक हैदर ने उस्ताद की मजार पर फातिहा पढ़ा। दिल्ली से आए कलाकारों ने भी उन्हें श्रद्धाजलि दी। फातमान के मुतवल्ली शफक रिजवी, अब्बास मुर्तुजा शम्सी, फरमान हैदर, शकील जादूगर वगैरह भी इस मौके पर मौजूद रहे।

कौन थे बिस्मिल्लाह खान